- केला

केला केला

केले में होने वाला एन्थ्राक्नोज़

फफूंद

Colletotrichum musae


संक्षेप में

  • फलों पर गहरे-भूरे से काले रंग के धंसे हुए धब्बे दिखाई देते हैं.
  • जो बड़े दागों के रूप में विकसित हो जाते हैं.
  • उनके केन्द्र में संतरी से लेकर गेरूआ गुलाबी रंग का फफूंद पैदा हो जाता है.
  • शीघ्र ही झड़ जाते हैं और सड़ जाते हैं।.
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लक्षण

इस फफूंद के कारण संक्रमित फल के छिलके पर गहरे-भूरे से लेकर काले, धॅंसे हुए धब्बे हो जाते हैं। आरंभिक लक्षण हरे फलों पर दिखाई देते हैं, और उन्हें गहरे-भूरे से काले दाल के आकार के काले, धॅंसे हुए घाव के साथ छिलके पर हल्के किनारों के द्वारा उन्हे पहचाना जाता है। पीले हो रहे फलों पर ये घाव विभिन्न आकारों के होते हैं और एक बड़ा धंसा हुआ काला धब्बा बनने के लिए मिल सकते हैं। उनके केन्द्र में संतरी से लेकर गेरूआ गुलाबी रंग का फफूंद पैदा हो जाता है। ये लक्षण फल के ऊपरी सिरे पर भी दिखने लग सकते हैं और ये पहले हुए फूलों के किसी संक्रमण के परिणामस्वरूप हो सकते हैं। प्रभावित फल समय से पूर्व पक सकते हैं, जिनमें गूदा सड़ता जाता है। पहले लक्षण तोड़े जाने के लंबे समय बाद, परिवहन या भण्डारण के दौरान भी दिखाई दे सकते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

एन्थ्राक्नोज़ कोलेटोट्रिचम म्यूसे फफूंद के कारण होता है, जो मृत या सड़ रही पत्तियों और फलों पर भी जीवित रहता है। इसके बीजाणु हवा, पानी और कीटों के साथ-साथ केलों से आहार ग्रहण करने वाले पक्षियो व चूहों द्वारा फैलाए जा सकते हैं। वे छिलके में मौजूद छोटे क्षतिग्रस्त स्थानों के ज़रिये प्रवेश करते हैं और बाद में उगते हैं और लक्षणों की अभिव्यक्ति करना आरंभ करते हैं। किसी संक्रमण के लिए अनुकूलनीय पर्यावरणीय स्थितियाँ बढ़ा हुआ तापमान, अधिक नमी और बार-बार होने वाली बरसातें होती हैं। ये लक्षण वृक्ष के गुच्छों पर पक रहे फलों में या तोड़ने के बाद भण्डारण के दौरान उत्पन्न हो सकते हैं। यह वह प्रमुख रोग है जो परिवहन व भण्डारण के दौरान केले के फलों की गुणवत्ता को प्रभावित करता है।

जैविक नियंत्रण

उपज को एकत्रित करने के समय फलों का 10 प्रतिशत अरबी गोंद के साथ 1.0 प्रतिशत चिटोसन (चिटिन का एक उत्पाद) पर आधारित जैविक-कवकनाशक से फलों का उपचार भण्डारण के दौरान आंशिक रूप से रोग का नियंत्रण कर सकता है। सिट्रिक के अर्क, ज़िजिबर ऑफ़िशिनेल राइज़ोम के अर्क के साथ-साथ एकेसिया एल्बिडा, पोलीएल्थिया लोन्गिफ़ेलिया और क्लेरोडेन्ड्रम इनर्म की पत्तियों के अर्क सहित विभिन्न प्रकार के पौधे पर आधारित मिश्रणों को रोगाणु को पनपने से रोकने में कुछ सफलता के साथ प्रयोग में लाया गया है। इन आशाजनक आँकड़ो का अभी भी ज़मीनी स्तर पर परीक्षण किया जाना शेष है। 2 मिनट के लिए 55° से. पर गर्म पानी में हरे फल को डुबोने से भी रोग के फैलने में कमी आती है।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हो, तो जैविक उपचारों के साथ रोकथाम उपायों के एक एकीकृत दृष्टिकोण पर हमेशा विचार करना चाहिए। उगने के दौरान, केले के गुच्छों पर मेंकोज़ोब (0.25 प्रतिशत) या बेंज़िमिडाज़ोल (0.05 प्रतिशत) का छिड़काव किया जा सकता है और बाद में किसी प्रकार से भी दूषित होने से बचाने के लिए उनको ढंक दिया जा सकता है। तोड़े हुए फलों को बेंज़िमिडाज़ोल युक्त कवकनाशकों में डुबोकर निकाला जा सकता है या उनपर इसका छिड़काव किया जा सकता है। फलों पर भोज्य-श्रेणी रसायन बुटीलेटेड हायड्रोक्सीएनिसोल (बीएचए) के आवरण में कवकनाशक की गतिविधि में वृद्धि करने की क्षमता हो सकती है।

निवारक उपाय

  • तोड़ने, पैकेजिंग करने और भण्डारण करने के दौरान केलों के ऊतकों को नुकसान से बचाएं.
  • गुच्छों के दिखना शुरू होने के बाद उनको दूषित होने से बचाने के लिए उनपर प्लास्टिक की आस्तीनें चढ़ाएं.
  • संसाधन स्थानों व भण्डारण केन्द्रों को साफ़ करें ताकि तोड़े जाने के बाद दूषित होने से बचाया जा सके.
  • फलों को फफूंद के बीजाणुओं से मुक्त करने के लिए पानी से धोएं.
  • सड़ रही पत्तियों और फूलों के बचे हुए भागों को हटाएं।.

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