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डंठल की कोयले जैसी सड़न

फफूंद

Macrophomina phaseolina


संक्षेप में

  • तनों के परिपक्व आंतरिक ऊतकों के काले रंग से बदरंग होने पर वे जले हुए दिखाई देते हैं.
  • गांठों के अंदर कड़े रेशेदार ऊतक काले कवक के काँटों जैसे दिखाई देते हैं.
  • पौधे समय से पहले ही पक जाते ते हैं और कमजोर डंठल होते हैं, जिससे टूटने या गिरने लगते हैं.
  • ऊपरी पत्तियां पहले पीले हो जाते हैं और फिर सूख जाती हैं।.
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लक्षण

यह मिट्टी से पैदा हुआ कवक बीजो के अंकुरण के चरण में जड़ों पर आक्रमण करता है और धीरे-धीरे लक्षणों के बिना जाहिर किये तनों तक का रास्ता खोजता है। बाद में, परिपक्व तनों के आंतरिक ऊतकों में एक काला मलिनकिरण दिखता है जो उन्हें जला हुआ दिखाते हैं, जिससे इसे यह नाम मिलता है। सड़न धीरे-धीरे संवहनी ऊतकों पर बसने लगती है, और गांठों के मध्यकाल कवक के काँटे से दिखाई देते हैं। परिवहन के ऊतकों का विनाश के कारण पानी की कमी के लक्षणों के समान लक्षण दिखते है। पौधे समय से पहले ही पकते हैं और कमजोर डंठल होते हैं, जिससे टूटना या गिरने लगते हैं। ऊपरी पत्तियां पहले पीले हो जाते हैं और फिर सूख जाती हैं।कत्थई पानी से भरे हुए घाव जड़ों पर मौजूद होते हैं। अधिक संक्रमण के मामलों में, 50% से अधिक पौधे टूट सकते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

यह रोग कवक मैक्रोफोमिना फेनोलिना के कारण होता है, जो गर्म और शुष्क वातावरण में पनपती होता है। यह मेजबान फसल के अवशेष या मिट्टी में तीन साल तक की अवधि तक जीवित रह सकता है। जड़ों और तनों के परिवहन ऊतकों के संक्रमण से पानी और पोषक तत्वों का परिवहन बाधित होता है, जिससे पौधे के ऊपरी हिस्से सूख जाते हैं, समय से पहले पकते और कमजोर डंठल होते हैं। कवक के प्रसार के लिए अन्य अनुकूल परिस्थितियां कीट, क्षतिग्रस्त जड़ों और टहनियों के साथ ही अन्य पौधे रोगों द्वारा प्रदान की जाती हैं। पौधों के विकास के बाद के चरणों में सूखा, मिट्टी के ऊंचे तापमान (28 डिग्री सेल्सियस से अधिक) और अत्यधिक उर्वरीकरण के दौरान लक्षण खराब हो जाते हैं।

जैविक नियंत्रण

खेती के खाद, नीम तेल के अर्क और सरसों की खली जैसे जजैविक उपचारों का उपयोग मैक्रोफोमीना रोगों को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है। मोती बाजरा और घास आधारित कंपोस्ट के साथ मृदा संशोधन से कवक की मिट्टी में आबादी में 20-40% कमी आ सकती है। बुआई के समय ट्राइकोग्रामा विर्दी (250 किग्रा वर्मीकम्पोस्ट या खेतों की खाद पर 5 किग्रा संवर्धित) का मिट्टी में उपयोग भी सहायक हो सकता है।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा निरोधात्मक उपायों के साथ जैविक उपचार, यदि उपलब्ध हों, के समन्वित उपयोग पर विचार करें। कवकनाशकों का पत्तियों पर उपयोग प्रभावी नही होता है क्योंकि प्रथम लक्षणों के दिखने तक नुकसान हो चुका होता है।अंकुरों के विकास के चरण में कवकनाशकों से उपचारित बीज (उदाहरण के लिए मेंकोजाब से) सुरक्षा दे सकते हैं। एमओपी का 80 किग्रा/हे की दर से दो अंशों में उपयोग पौधों की जीवनशक्ति बढ़ाने में तथा इस कवक के प्रति अधिक सहनशील बनाने में सहायक होता है।

निवारक उपाय

  • सूझे के प्रति सहनशील प्रजातियाँ लगाएं.
  • गिरने के प्रतिरोधी प्रजातियों के रोपण करें.
  • बुवाई की तारीख को समायोजित करें ताकि पुष्पीकरण के बाद के चरण बढ़ते मौसम के सबसे शुष्क भाग में न हों.
  • पौधों के बीच अधिक स्थान छोड़ें.
  • सिंचाई के माध्यम से मिट्टी की अच्छी नमी को बनाए रखें, विशेष रूप से पुष्पीकरण की अवधि के बाद.
  • संतुलित उर्वरीकरण सुनिश्चित करें और अत्यधिक नाइट्रोजन उपयोग से बचें.
  • उपज को अधिक हानि से बचाने के लिए फसल की जल्द कटाई करें.
  • गैर-मेजबान फसलों जैसे कि छोटे गेहूं, जई, चावल, जौ और राई तीन साल तक फसल चक्रीकरण करें.
  • मिट्टी में संक्रमण कम करने के लिए गर्मियों में गहरी जुताई करें.
  • इससे मिट्टी में कवक की जनसंख्या कम करने में सहायता मिलती है.
  • मिट्टी का सौरिकरण या जुताई के बाद लंबे समय तक परती छोड़ देना भी प्रभावी होता है.
  • प्रकोप वाले इलाकों में किसानों को मक्का की बुआई से पहले मिट्टी में हरी खाद के समावेश की सलाह दी जाती है।.

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