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बैंगन बैंगन

फ़ोमोप्सिस झुलसा रोग

फफूंद

Phomopsis vexans


संक्षेप में

  • फलों पर कत्थई, मुलायम, धँसे हुए घाव.
  • पत्तियों पर हल्के केंद्र वाले भूरे से कत्थई धब्बे.
  • पत्तियों का झुलसना और मुरझाना.
  • तनों पे गहरे, धँसे हुए केंकर।.
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लक्षण

लक्षण पत्तियों, तनों और फलों पर दिखते हैं, हालांकि फलों पर ज़्यादा नज़र आते हैं। पत्तियों पर छोटे धूसर से भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं, बाद में जिनकी संख्या बढ़ जाती हैं और जो पूरे पत्ती फलक पर फैल जाते हैं। गंभीर रूप से संक्रमित पत्तियों का हरा रंग उड़ जाता है, पत्तियां मुरझा जाती हैं और ऊतक फट और चटक जाते हैं (पत्तियों का झुलसना)। तनों पर भूरे से गहरे रंग के फटे हुए नासूर बन जाते हैं। पौधे के आधार पर ये नासूर तने पर शिकंजा कसकर पानी और पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित कर देते हैं जिससे अंत में पौधा मर जाता है। फलों पर भूरे, मुलायम, धंसे हुए दाग़ नज़र आते हैं। बढ़ने पर ये अक्सर आपस में मिलकर फल का बड़ा हिस्सा ढंक लेते हैं और इनके किनारों पर काली चित्तियों वाले एक के अंदर एक छल्ले नज़र आने लग जाते हैं। अंत में फल सड़ जाता है। काली चित्तियां पत्तियों और तनों के पुराने दाग़ों पर भी नज़र आती हैं। अगर मौसम सूखा हो, तो फल सिकुड़ और सूख जाता है और ममी जैसा होकर पौधे से लटका रहता है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

लक्षणों का कारण फफूंद फ़ोमोप्सिस वेक्संस है जो आम तौर पर बैंगन को ही निशाना बनाता है (हालांकि टमाटर और हरी मिर्च में संक्रमण के कुछ मामले रिपोर्ट किए गए हैं)। फफूंद फ़सल के कूड़े में जीवित रहता है और हवा और बारिश से स्वस्थ पौधों पर फैलता है। यह भी माना जाता है कि यह बीजों के अंदर और ऊपर रहकर भी फैलता है। इसी कारण इस रोग से लड़ने के लिए प्रमाणित बीजों और स्वस्थ पौध का इस्तेमाल बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। बीजाणु 6-12 घंटे के अंदर पत्ती के अंदर घुस सकता है जबकि गर्म (27-35° सेल्सियस) और नम स्थितियां संक्रमण होने और रोग बढ़ने के लिए ज़रूरी हैं। भंडारण कक्षों में 30° सेल्सियस तापमान और 50% सापेक्षिक आर्द्रता में फलों पर दाग़ सबसे ज़्यादा बनते हैं।

जैविक नियंत्रण

जैविक कवकनाशकों से उपचार रोग लगने और प्रकोप कम करने में उपयोगी हो सकता है। कॉपर घोलों पर आधारित उत्पादों, जैसे कि बोर्डो मिश्रण का इस्तेमाल पत्तियों पर छिड़काव के रूप में किया जा सकता है। नीम के सत्त का इस्तेमाल सुरक्षित और पर्यावरण-अनुकूल तरीके से रोग प्रबंधन के लिए किया जा चुका है। गर्म पानी (56° सेल्सियस पर 15 मिनट) से बीजों का उपचार करने के बारे में सोचा जा सकता है।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा एक समन्वित दृष्टिकोण से रोकथाम उपायों के साथ उपलब्ध जैविक उपचारों का इस्तेमाल करें। अगर खेत में रोग की पहचान कर ली गई है और आर्थिक नुकसान होने लगा है तो कवकनाशकों से उपचार की सलाह है। पत्तियों पर छिड़काव के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान्य कवकनाशकों में एज़ॉक्सीस्ट्रोबिन, बोस्कैलिड, कैप्टान, क्लोरोथैलोनिल, कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, डाइथियोकार्बामेट्स, मैनेब, मैंकोज़ेब, थियोफैनेट-मिथाइल, टॉलक्लोफ़ॉस-मिथाइल, पाइरैक्लोस्ट्रोबिन शामिल हैं। कवकनाशक तब ज़्यादा प्रभावी होते हैं जब इनका इस्तेमाल खेतीबाड़ी के अच्छे तौर-तरीकों के साथ किया जाता है। बीज उपचार के बारे में भी सोचा जा सकता है, उदाहरण के लिए थियोफ़ेनेट मिथाइल (0.2%) के साथ।

निवारक उपाय

  • विश्वनीय स्रोतों से उच्च गुणवत्ता वाले प्रमाणित बीज ही इस्तेमाल करें या फिर स्वस्थ पौधों से बीज एकत्र करें.
  • अगर उपलब्ध हों तो बाज़ार की ज़रूरत ध्यान में रखते हुए प्रतिरोधी किस्में लगाएं.
  • पौधों और उनकी कतारों के बीच ज़्यादा स्थान छोड़ें.
  • पौधों को हवा की दिशा के समानांतर रोपित करें ताकि पत्तियां जल्द सूख सकें.
  • सिंचाई की योजना इस प्रकार बनाएं कि पत्तियों को शाम से पूर्व सूखने के समय मिल सके.
  • कम नाइट्रोजन दर और अधिक फ़ॉस्फ़ोरस और पोटेशियम दर वाले उर्वरकों का इस्तेमाल करें.
  • फल तोड़ने के बाद पौधों के अवशेष हटाकर नष्ट कर दें (गहरी जुताई करें या जलाएं).
  • फलों को सर्वोत्तम भंडारण तापमान (ठंडा और सूखा) पर रखें.
  • फसलों के मध्य फसल चक्रीकरण (3 वर्ष या इससे अधिक) अपनाएं।.

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