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पत्ती के भूरे धब्बे

फफूंद

Stemphylium solani


संक्षेप में

  • ऊपरी पत्तियों पर सफे़द केंद्र और बैंगनी किनारों वाले संकेंद्रित तरह के घाव.
  • पत्तियों के ऊतकों का चटकना और दिखने में "शॉट-होल" (चोट के कारण गोल छेद) जैसा दिखना.
  • पोटैशियम की कमी से गहन संबंध।.
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लक्षण

पत्तियों के भूरे धब्बे व्यास में लगभग 2 सेंटीमीटर तक, आकार में गोलाकार, और बैंगनी किनारों के होते हैं। जैसे-जैसे वे विकसित होते हैं, ये बढ़ते हुए संकेंद्रित स्वरूप बनाते हैं और घावों के मध्य एक सफे़द केंद्र बन जाता है, जो बाद में फट जाता है और बाहर गिर जाता है, और एक "शॉट-होल" (गोल छेद) बना देता है। घाव आम तौर पर छतरी में ऊपरी पत्तियों पर बनते हैं और पत्तियों के किनारों से बनते हुए अंदर की ओर बढ़ते हैं। पुष्पीकरण की अंतिम अवस्था में पोषक तत्वों की उच्च माँग के कारण पौधों की ऊपरी पत्तियाँ उस समय संक्रमण के प्रति सर्वाधिक संवेदनशील होती हैं। यदि समय पर पता चल जाये और पोटैशियम से उपचार किया जाए, तो यह रोग द्वितीयक होता है। किंतु यदि इसे पहचाना न जाये, तो इसके कारण बहुत अधिक मात्रा में असमय पर्णपात और उपज में हानि होती है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

लक्षण कवक स्टेमफ़ाइलम सोलानी के कारण होते हैं। इसके प्रकोप और रोग के विकास के लिए उच्च आर्द्रता, लगातार वर्षा और लंबे समय तक सूखा भी अनुकूल होता है। शारीरिक तथा पोषण सम्बन्धी तनाव, विशेषतः पुष्पीकरण या बीजकोष निर्माण के समय, भी महत्वपूर्ण कारक होते हैं। प्रमुख कारण पोटैशियम की कमी है, किंतु इसके साथ सूखा, कीड़ों या मिट्टी में गोल कृमि की उपस्थिति भी कारण हो सकते हैं। इन कवकों के अन्य पौधों तक प्रसार में हवा भी सहायक होती है। रोग के विकास के लिए 20-30 डिग्री सेल्सियस का तापमान आदर्श होता है। यह कवक अल्टरनेरिया और सरकोस्पोरा प्रजाति के कवकों के साथ मिल कर रोग को जटिल बना सकता है और एक ही खेत मे देखा जा सकता है। वैकल्पिक मेज़बानों में कपास, टमाटर,आलू, मिर्च, बैंगन और प्याज़ शामिल हैं।

जैविक नियंत्रण

आज तक इस रोग का कोई जैविक नियंत्रण ज्ञात नहीं है। इससे बचने के लिए निरोधात्मक उपायों का पालन करें।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा निरोधात्मक उपायों और यदि उपलब्ध हों तो जैविक उपचारों के साथ एक समन्वित दृष्टिकोण अपनाएं। इस रोग के उपचार के लिए कवकनाशक (पायराक्लोस्ट्रोबिन, पायराक्लोस्ट्रोबिन + मेटाकोनज़ोल) उपलब्ध हैं, किंतु आम तौर पर इनके प्रयोग की सलाह नहीं दी जाती है क्योंकि यह आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है।

निवारक उपाय

  • अगर हो सके, तो खेतों में पोटैशियम की जाँच करें और आवश्यक होने पर इस पोषक तत्व का बुनियादी उर्वरीकरण के अंग के रूप में प्रयोग करें.
  • पोटैशियम की कम आवश्यकता वाली लंबे मौसम वाली प्रजातियों की रोपाई करें.
  • रोग के चिन्हों के लिए खेतों की नियमित निगरानी करें.
  • संतुलित उर्वरीकरण के साथ मज़बूत फसल उपजाएं.
  • पोटैशियम से समृद्ध उर्वरकों का समयबद्ध तरीके से (हिस्सों में प्रयोग), विशेषतः बलुही मिट्टी में, प्रयोग करें.
  • आवश्यक होने पर, फूलों के खिलने के प्रथम चार सप्ताहों में पत्तियों पर अनुप्रयोग नियोजित करें.
  • समस्या को हल करने के लिए पोटैशियम का आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल न करें.
  • सूखे के प्रभाव से बचने के लिए नियमित सिंचाई करें।.

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