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फलों की फफूंद

फफूंद

Aspergillus spp.


संक्षेप में

  • फलों के छिलकों का रंग खराब होने लगता है और सड़ांध हो जाती है.
  • यह विशेषत: फलों के स्फुटन के दौरान होता है.
  • सबसें ज़्यादा नाश उन फलों का होता है जिन पर पिस्ता कीट (हल्के हरे रंग के कीट ) का हमला होता है।.
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लक्षण

यदि फलों की परिपक्वता अवधि के दौरान आर्द्रता अधिक हो, तो बुरी तरह से फंफूद लग जाती है और पिस्ता फल सड़ जाते हैं। इसमें मुख्यत: छिलके बेरंग हो जाते हैं और कुछ मामलों में खुशबूहीन तथा रंगहीन एल्फ़ाटॉक्सिन (ये ज़हरीले होते हैं और वनस्पति पौधों को नुकसान पहुचाते हैं।) की पैदवार होती है। इनका बेरंग होना और हानि, जत्थों की आबादी की स्थिति के आधार पर या फंफूद के प्रकार के आधार पर ज़्यादा या कम होती है। अक्सर, छिलके गहरे पील से पीले या भूरे हो जाते हैं। छिलकों के नीचे, फंफूद की बढ़त कोषों में दिखायी पड़ती है जो कि धब्बेदार हो सकते हैं। छिलके हमेशा कोषों से चिपके रहते हैं। स्फुटित फल और कीटों द्वारा हमला किये गये फलों विशेषकर प्रभावित होते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

एस्परगिलस की कई प्रजातियों के कारण ,परन्तु पेनिसिलियम, स्टेम्लिफाइलियम या फ़्युज़ेरियम की कुछ प्रजातियों से भी पिस्ता के फलों में सड़ांध हो जाती है। यह बीमारी कीट संक्रमण, मुख्यतया पिस्ता बीज का कीट (मेगास्टिगमस पिस्ता जो कि उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व देशों में पाया जाता है) और यूरीटोमा पिस्ता बीज हड्डे (प्लाोटनिकोवी), से सम्बन्धित होता है। इन कीटों द्वारा किये गये छेद फंफूद के प्रवेश को सुगम बनाते हैं। परिपक्वता अवधि में उच्च तापमान, नम और आर्द्र स्थितियां इस बीमारी के लिए अनुकूल स्थितियां हैं। हांलाकि सामान्य दशाओं के मुकाबले शुष्क स्थितियों में एस्परगिलस एसपीपी, द्वारा संक्रमण की अधिक संभावना होती है। अंधेरा और वायु संचार में कमी भी इस बीमारी के फैलने में योगदान देते हैं। बंसत में देर से और गर्मी में जल्दी पानी की कमी होना सड़े हुए फलों की संख्या को बढ़ा सकता है और इस प्रकार बीमारी चक्र को प्रोत्साहित करता है।

जैविक नियंत्रण

इस बीमारी के उपचार के लिए कोई प्रभावी जैविक उपचार नही हैं। हांलाकि, अनुकूल जलवायु दशाओं में, तांबा-आधारित फंफूदनाशकों के संतोषजनक प्रभाव दिखाई देते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हो तो हमेशा जैविक उपचारों के साथ निवारक उपायों के एकीकृत दृष्टिकोण को अपनायें। कीटनाशकों की मदद से मेगास्टिगमस पिस्ताशे और यूरीटोमा प्लोटनिकोवी को नियंत्रित करें। क्लोरोथालोनिल (200 मिलीलीटर/100लीटर) या तांबा पर आधारित उत्पादों का प्रयोग प्रभावित पौधों के निवारक के रूप में करें। फसल के अंत में इनका प्रयोग बहुत प्रभावशाली होता है क्योंकि ये बीमारी को फलों पर सर्दियों में बने रहने से रोकता है। उपचार की प्रभावकारिता इसके उपयोग के समय, अनुशंसित खुराक के उपयोग और पिचकारी की तीव्रता पर निर्भर करती है।

निवारक उपाय

  • पिस्ताशिया अटलांटिका को कलम न करें क्याकि इनसें जल्दी स्फुटित होने वाले फलों की मात्रा बढ़ जाती है.
  • सुनिश्चित करें कि बसन्त में देर से और गर्मी में जल्दी पानी दें क्योंकि सूखा पड़ने से स्फुटित फलों की संख्या बढ़ सकती है.
  • लम्बे समय के लिए पिस्ता को अंधेरे में और खराब वायु संचार वाले स्थान पर संचित करने से बचें.
  • मेगास्टिगमस पिस्ताशे (पिस्ता बीज का कीट जो कि उत्तरी अफ्रीका और भूमध्यसागरीय और मध्य पूर्व देशों में पाया जाता है) और यूरीटोमा प्लोटनिकोवी (पिस्ता बीज हड्डा) के हमलों से बचायें.
  • मौसम में देरी से कटाई से बचें और जब मौसम नम और गीला हो तो कटाई न करें।.

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