- गेहूं

गेहूं गेहूं

अल्टरनेरिया पत्ती झुलसा रोग

फफूंद

Alternaria triticina


संक्षेप में

  • गेहूं के पौधों के 7-8 सप्ताह का होने पर यह रोग प्रकट होता है.
  • फसल पकने तक स्थिति विकट हो जाती है.
  • छोटे, अंडाकार, रंग उड़े हुए धब्बे पत्तियों पर जहां-तहां अनियमित रूप से दिखाई देते हैं.
  • जैसे-जैसे ये धब्बे बढ़ते हैं, ये गहरे भूरे से धूसर रंग के हो जाते हैं और आकृति में टेढ़े-मेढ़े होते हैं.
  • पत्तियां अंततः सूख जाती हैं।.
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लक्षण

तरुण पौधे रोगाणु प्रतिरोधी होते हैं। सबसे नीचे की पत्तियां सबसे पहले संक्रमण के संकेत प्रदर्शित करती हैं। इसके बाद संक्रमण ऊपर की पत्तियों तक फैल जाता है। संक्रमण की शुरुआत नीचे की पत्तियों पर जहां-तहां पड़े छोटे, अंडाकार और हरिमाहीन धब्बों के रूप में होती है जो धीरे-धीरे ऊपर की पत्तियों तक फैल जाते हैं। समय के साथ धब्बे बढ़कर अनियमित आकृति के हो जाते हैं और गहरे भूरे या धूसर धंसे हुए धब्बों के रूप में विकसित होते हैं। धब्बों के किनारों पर चमकीला पीला क्षेत्र हो सकता है जो कि व्यास में 1 सेंमी. या ज़्यादा बढ़ सकता है। नमी वाली परिस्थितियों में, धब्बों पर काली चूर्ण जैसी फफूंद छा सकती है। रोग के बाद की अवस्थाओं में, धब्बे आपस में मिल जाते हैं जिससे पूरी पत्ती मृत हो जाती है। गंभीर मामलों में पत्ती आवरण, बाली और पत्राभ (ग्लूम) भी प्रभावित हो जाते हैं और झुलसे हुए दिखते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

क्षति का कारण फफूंद अल्टरनेरिया ट्रिटिचिना है। संक्रमण मिट्टी और बीज दोनों से होता है और हवा से फैल सकता है। संक्रमित बीज स्वस्थ बीजों की तुलना में छोटे और अक्सर सिकुड़े हो सकते हैं। इनका भूरा रंग पड़ जाता है। पौधे तब संक्रमित होते हैं जब उन्हें संक्रमित मिट्टी में लगाया जाता है या जब वे संक्रमित फसल अवशेषों (जैसे कि बारिश की फुहारें या सीधा संपर्क) के संपर्क में आते हैं। गर्मियों में फफूंद मिट्टी पर पड़े संक्रमित कूड़े में दो महीने जबकि दबे हुए कूड़े में चार महीने तक जीवित रह सकता है। रोग लगने की आशंका पौधे की उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ जाती है क्योंकि ए. ट्रिटिचिना लगभग चार सप्ताह की आयु से कम वाले गेहूं के पौधों को संक्रमित नहीं कर पाता है। लक्षण तब तक नहीं स्पष्ट होते जब तक कि पौधा लगभग सात सप्ताह का नहीं हो जाता है। संक्रमण और रोग विकास के लिए 20-25 डिग्री तापमान आदर्श है। विकट परिस्थितियों में उपज हानि 80% से ज़्यादा हो सकती है।

जैविक नियंत्रण

बीजों से होने वाले संक्रमण को बीज के 2.5 प्रति किग्रा बीज की दर से विटावैक्स द्वारा उपचार करके नियंत्रित किया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा विरिडे और विटवैक्स का मिश्रण संक्रमण को और बढ़ने से रोकता है (98.4% तक)। पहले और दूसरे छिड़काव में ज़िनैब के साथ यूरिया को 2-3% की दर से मिलाएं। नीम की पत्तियों का अर्क लगाएं। बीजों से फैलने वाले रोगाणुओं की रोकथाम के लिए कवकनाशक और गर्म पानी का उपचार इस्तेमाल किया गया है। रोग को महामारी का रूप लेने से रोकने के लिए रोगाणु ट्राइकोडर्मा विरिडे (2%) और टी. हर्ज़ियेनम (2%), एस्परजिलस हुमिकोला और बैसिलस सब्टिलिस का इस्तेमाल अक्सर किया जाता है।

रासायनिक नियंत्रण

रोकथाम उपायों के साथ-साथ उपलब्ध जैविक उपचारों को लेकर हमेशा एक समेकित कार्यविधि पर विचार करें। कवकनाशकों से ए. ट्रिटिचिना पर नियंत्रण किया जा सकता है। इससे रोग की तीव्रता में 75% कमी आती है और उपज बढ़ती है। कवकनाशकों जैसे कि मैंकोज़ेब, ज़िरैम, ज़िनेब (0.2%), थिरैम, फ़ाइटोलैन, प्रोपिनेब, क्लोरोथैलोनिल और नैबाम, प्रोपिकॉनेज़ॉल (0.15%), टेबुकॉनेज़ॉल और हेक्साकॉनेज़ॉल (0.5%) का इस्तेमाल करें। मैंकोज़ेब के प्रति सहनशीलता पैदा होने से रोकने के लिए कवकनाशकों के संयोजन का इस्तेमाल करें।

निवारक उपाय

  • कम संवेदनशील किस्मों के साथ-साथ प्रमाणित स्रोतों से स्वस्थ बीजों का ही प्रयोग करें.
  • सर्वोत्तम साफ़-सफ़ाई तरीके अपनाएं.
  • संक्रमित फसल को जलाकर या हल चलाकर नष्ट कर देना चाहिए.
  • इससे संक्रमित फसल अवशेषों से रोगाणु का हवा के माध्यम से फैलाव रुकेगा.
  • संक्रमित फसल को नष्ट करने के लिए तृणनाशकों का इस्तेमाल करना चाहिए.
  • संक्रमित खेतों में कम से कम दो वर्ष के लिए दोबारा बुवाई नहीं करनी चाहिए.
  • फेंकने योग्य उपकरण, संक्रमित पौधा सामग्री या मिट्टी का ऑटोक्लेव, उच्च तापमान पर जलाकर या मिट्टी में गहराई में दबाकर निस्तारण कर देना चाहिए.
  • निस्तारण के लिए खेत से हटाए गए किसी उपकरण को दो थैलों में बंद करना चाहिए.
  • रोगाणु की उत्तरजीविता और बाद में महामारी फैला सकने वाले प्राथमिक रोगजनक पर लगाम लगाने के लिए फसल काटने के बाद फसल अवशेष को मिट्टी में गहराई में दबा देना चाहिए.
  • पौधों की पंक्तियों को प्रचलित वायु दिशा में रोपित करके, पौधों की संख्या घटाकर और पंक्तियों के बीच अंतराल बढ़ाकर छत्र में वायु संचार को बढ़ावा देना चाहिए.
  • शाम के समय और भूमि की ऊपर से सिंचाई करने से बचें ताकि पत्तियों के गीला रहने की अवधि कम की जा सके.
  • पर्याप्त उर्वरक डालें।.

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