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सोयाबीन का भूरा तना सड़न रोग (ब्राउन स्टेम रॉट)

फफूंद

Cadophora gregata


संक्षेप में

  • संवहनी और गूदा ऊतकों का रंग भूरे से लाल भूरा होना.
  • मौसम की शुरुआत में जड़ों में संक्रमण.
  • लक्षण 17 और 27 डिग्री सेल्सियस के बीच और बदतर हो जाते हैं।.
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लक्षण

रोग का कारण फफूंद फ़ियालोफ़ोरा ग्रेगैटा है, जो सोयाबीन के अवशेषों में जीवित रहता है। रोगाणु सोयाबीन की जड़ों को मौसम की शुरुआत में संक्रमित करता है। हालांकि पौधा फलियां भरने तक इसके लक्षण प्रदर्शित नहीं करता है। आम तौर पर, हरिमा हीनता और परिगलन के साथ-साथ संवहनी ऊतकों का रंग भूरा पड़ता है। कुछ मामलों में, केवल आंतरिक संवहनी ऊतक भूरे पड़ जाते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

भूरा तना सड़न रोग का रोगाणु सोयाबीन के अवशेषों में जीवित रहता है। यह अवशेषों में रोगाणु के परजीवी चरण के दौरान बसावट शुरू करता है। रोग की गंभीरता मौसम, मिट्टी के पर्यावरण और फसल प्रबंधन प्रणाली पर निर्भर करती है। तना और पत्तियों पर लक्षण तब सबसे ज़्यादा विकराल होते हैं जब हवा का तापमान 60 से 80 डिग्री फ़ारेनहाइट के बीच होता है।

जैविक नियंत्रण

भूरा तना सड़न रोग का खतरा कम करने के लिए मिट्टी का पीएच स्तर 7 पर बनाए रखें।

रासायनिक नियंत्रण

पत्तियों पर फफूंदनाशक के छिड़काव का भूरा तना सड़न रोग पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके अलावा, बीज उपचारित करने वाले फफूंदनाशक भी अप्रभावी रहते हैं क्योंकि सामग्री फैलने के बाद संक्रमण रोकने के लिए केवल नवांकुर की सुरक्षा करना ही पर्याप्त नहीं है।

निवारक उपाय

  • सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन विधियां अपनाएं, जैसे कि फसल चक्रीकरण, विशेषकर 2 से 3 वर्ष तक गैर-मेज़बान फसलें सोयबीन के बीच में लगाएं.
  • अन्य उपायों में किस्म का चुनाव और जुताई भी प्रभावी साबित हुए हैं.
  • रोग-प्रतिरोधी सोयाबीन किस्मों और उपकिस्मों का इस्तेमाल तभी करें जब संक्रमित खेत में उच्च रोग दबाव अपेक्षित हो।.

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