- बेर

बेर बेर

शार्का (प्लम पॉक्स विषाणु)

वाइरस

Plum Pox Virus


संक्षेप में

  • पत्तियों और फल पर हरीत हीन और गले हुए गोल आकार के स्वरूप, पट्टियां या धब्बे.
  • विकृत पत्तियाँ और फल, या उनकी गुठलियों पर गोल आकार.
  • कुछ भिन्न प्रजातियों में फल का गिरने और छाल के फटने की स्थिति देखी जाती है।.
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लक्षण

जीनस प्रूनस वृक्षों में, प्लम पॉक्स विषाणु के लक्षण मुख्यतः पत्तियों व फलों पर दिखाई देते हैं, किन्तु फूल व बीज भी प्रभावित हो सकते हैं। लक्षणों की गंभीरता वृक्षों की प्रजातियों व प्रकार, पीपीवी (प्लम पॉक्स विषाणु) प्रकार और पर्यावरणीय स्थितियाँ के अनुसार भिन्न-भिन्न होती हैं। ये विशिष्ट रूप से वसन्त ऋतु में पत्तियों पर दिखाई देते हैं। ये गोल आकार के क्लोरोसिस (पीला पड़ना) और परिगलन (भूरा पड़ना) के चिह्न, शिराओं का मिटना, हरीत हीन धारियाँ या धब्बे और कभी-कभी विकृति दर्शाते हैं। खुबानी और आलूबुखारे के फल विकृत हो सकते हैं और अंदरूनी गूदा भूरे रंग का हो सकता है। उनके छिलके और उनकी गुठलियों पर भी हल्के पीले रंग के घेरे या धब्बे उपस्थित हो सकते हैं। आड़ू की कुछ प्रजातियाँ के फूलों में पंखुड़ियां का रंग फीका पड़ जाता है। आलूबुखारे की संवेदनशील प्रजातियों में कच्चे फलों का गिरना और छाल का फटना दिखाई दे सकता है। कुछ मीठे चेरी के फलों में हरीमा हीनता और गोल आकर का परिगलन, दाँतेदार धब्बे, और कच्चे फलों के गिरने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

यह विषाणु कई गुठलियों वाले फलों के वृक्षों और जीनस प्रूनस के जंगली प्रतिनिधियों को प्रभावित करता है, जिसमें बादाम का वृक्ष एक उल्लेखनीय अपवाद है। कई प्रजातियों के कई वैकल्पिक समूह मौजूद हैं। यह विषाणु संक्रमित वृक्षों से या तो ग्राफ्टिंग या, अनिरन्तर रूप से एफ़िड रोगवाहकों के द्वारा प्रसारित किया जा सकता है। किसी बगीचे में संक्रमित होने वाले वृक्षों की संख्या, एक विशिष्ट मौसम में, पंखों वाले एफ़िड कीटों की संख्या से सीधे तौर पर संबंधित होती है। एफ़िड 30 सेकंड के अल्प समय में संक्रमित वृक्षों पर आहार करते हुए विषाणु को ग्रहण कर लेते हैं। बाद में, वे इसे करीब 1 घंटे तक दूसरे पौधों में प्रसारित कर सकते हैं। जिन एफ़िड कीटों को आहार से पहले भूखा रखा गया है वे इसे ग्रहण करने के 3 घंटे तक प्रसारित कर सकते हैं। वर्तमान समय में, यूरोप में करीब 10 करोड़ गुठलियों वाले वृक्ष इससे प्रभावित हैं, और संवेदनशील प्रजातियों में इसके कारण उपज को 80 से 100 प्रतिशत तक का नुकसान झेलना पड़ सकता है।

जैविक नियंत्रण

शिकारी लेडीबग, लेसविंग, सोल्जर भृंग और पेरासिटोइड ततैये जैसे लाभकारी कीट, पीपीवी के मुख्य कई रोगवाहक एफ़िडों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करते हैं। एफ़िड के हल्के संक्रमण के मामले में, एक सामान्य नरम कीटनाशक साबुन के घोल या पौधों के तेलों पर आधारित घोल का प्रयोग प्रभवित पत्तियों पर छिड़काव के लिए करें। अगर उनकी संख्या कम है, तो प्रभावित पौधों पर सामान्य रूप से ज़ोर से पानी का छिड़काव करने से भी वे हट सकते हैं। नमी युक्त मौसम में, एफ़िड फफूंद रोगों के प्रति अतिसंवेदनशील होते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

अगर उपलब्ध हो, तो जैविक उपचार और बचाव उपायों के साथ एक संयुक्त दृष्टिकोण पर हमेशा विचार करें। विषाणुओं के द्वारा होने वाले रोगों को कीटनाशकों द्वारा सीधे तौर पर नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। लेकिन, पीपीवी फैलाने वाले एफ़िड कीटों के विरूद्ध पत्तों पर छिड़काव के रूप में सायपरमेथ्रिन या क्लोपायरिफ़ोस युक्त कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता।

निवारक उपाय

  • ग्राफ्टिंग हेतु स्वस्थ पौधों का उपयोग करें या प्रमाणित विषाणुमुक्त वृक्षों को खरीदें.
  • अगर उस क्षेत्र में उपलब्ध हों, तो रोग प्रतिरोधी प्रजातियों का रोपण करें.
  • एफ़िड एवं रोग के लक्षणों की मौजूदगी के लिए फल के बगीचे की नियमित रूप से निगरानी करें और तत्काल रोगग्रस्त शाखाओं को नष्ट कर दें (जलाकर या गाड़कर).
  • लाभकारी कीटों की संख्या प्रभावित ना हो उसके लिए उपचार हेतु कीटनाशकों का नियंत्रित रूप से प्रयोग करें।.

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