- धान

धान धान

टुन्ग्रो

वाइरस

RTBV


संक्षेप में

  • अवरुद्ध विकास.
  • किल्लों में कमी.
  • पत्तियों में छोटे, गहरे कत्थई धब्बों के साथ पीलापन.
  • इसे पोटैशियम की कमी समझने की गलती की जा सकती है।.
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लक्षण

पौधे आर.ट.बी.वी. तथा आर.टी.एस.वी. दोनों विषाणुओं या किसी एक से संक्रमित हो सकते हैं। धान का हरा पत्ती फुदका रोगवाहक है। दोहरे संक्रमण के शिकार पौधे विशिष्ट कथित “टुन्ग्रो लक्षण” दिखाते हैं, जिसमें पौधे में अवरुद्ध विकास दिखाई देता है और कम किल्ले निकलते हैं। उनकी पत्तियाँ का रंग नोक से आरम्भ होते हुए निचले भाग तक पीली या नारंगी-पीली होती जाती हैं। बदरंग पत्तियों में असमान, छोटे गहरे कत्थई धब्बे भी हो सकते हैं। छोटे पौधों में अन्तःशिरा पर्ण हरित हीनता (क्लोरोसिस) भी दिखाई दे सकती है। आर.ट.बी.वी. या आर.टी.एस.वी. में से एक का प्रकोप होने से लक्षण हल्के पाए जाते हैं (उदाहरण के लिए, विकास की गति बहुत कम अवरुद्ध रहती है तथा पत्तियों में कोई पीलापन नहीं होता है)। लक्षणों को पोटैशियम की कमी समझने की गलती की जा सकती है, लेकिन टुंग्रो एक खेत में कुछ क्षेत्रों में होता है, जबकि पोटैशियम की कमी पूरे खेत में दिखाई देती है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

विषाणु का प्रसार नेफ़ोटेटिक्स वायरेसेंस नाम के एक पत्ती फुदका द्वारा होता है। टुन्ग्रो उन खेतों में अधिक फैलता है जहाँ कम अवधि में पकने वाले ज़्यादा उपज देने वाले चावल के पौधे हों, जिनसे चावल उगाने वाले साल में दो फसलें प्राप्त कर सकते हैं। एक बार यदि चावल का पौधा टुन्ग्रो से संक्रमित हो जाता है, तो इसका उपचार नहीं किया जा सकता। सीधे रोग नियंत्रण की अपेक्षा रोकथाम उपाय अधिक कारगर हैं। चावल की दो फ़सल लेने वाली प्रणाली तथा चावल की आनुवांशिक समानता मुख्य कारण हैं जिनके कारण टुन्ग्रो रोग खेतों में दिखाई देता है। बारिश द्वारा पोषित या ऊंचाई पर उगाये गए चावल की फ़सलों की अपेक्षा सिंचित खेतों के चावल के पौधों में यह रोग होने की अधिक संभावना होती है। पौधों के अवशेष तथा ठूंठ भी संक्रमण का एक स्त्रोत हैं।

जैविक नियंत्रण

हरे पत्ती फुदका रोगवाहक को आकर्षित तथा नियंत्रित करने के साथ उनकी जनसंख्या की निगरानी रखने में प्रकाश जालों का सफलतापूर्वक उपयोग किया गया है। भोर के समय, प्रकाश जालों के समीप उतरने वाले पत्ती फुदका की आबादी को पकड़ कर मार दिया जाना चाहिए या कीटनाशकों के छिड़काव/फैलाव से नष्ट करना चाहिए। ऐसा रोज़ करना चाहिए।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा समवेत उपायों का प्रयोग करना चाहिए जिसमें रोकथाम के उपायों के साथ जैविक उपचार, यदि उपलब्ध हों, का उपयोग किया जाए। रोपाई के 15 से 30 दिनों बाद बुप्रोफ़ेज़िन या पायमेट्रोज़िन आधारित कीटनाशकों का समय पर छिड़काव सफलता दे सकता है। लेकिन, पत्ती फुदका आसपास के खेतों में जा सकता है और बहुत कम समय में टुन्ग्रो को फैला सकता है। इसलिए, खेत के आसपास के पौधों में भी कीटनाशक का छिड़काव किया जाना चाहिए। क्लोरपायरिफ़ोस, लाम्ब्डा सायहेलोथ्रिन या अन्य सिंथेटिक पायरेथ्रोइड संयोजनों के उपयोग से बचें क्योंकि पत्ती के फुदके ने इसके प्रति कुछ हद तक प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है।

निवारक उपाय

  • रोगवाहकों के प्रति विभिन्न स्तर के प्रतिरोध क्षमता वाली फसलों का प्रयोग करें.
  • रोगवाहकों की कम संख्या वाले महीनों में दो फ़सलों का रोपण करें.
  • गैर-धारक फसलों के साथ फसल चक्रीकरण कीजिये.
  • रोपाई की योजना इस प्रकार बनाएं कि पूरे क्षेत्र में लगभग एक-साथ बढ़त हो.
  • जुताई से अण्डों तथा प्रजनन स्थलों को नष्ट कर दें.
  • खेत को एक के बाद एक गीला करने और सुखाने की योजना अपनाएं.
  • लाभदायक कीटों को सुरक्षित रखने की कोशिश करें।.

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