- सेम

सेम सेम

उड़द की फ़लियों का पत्तियों की सिकुड़न वाला विषाणु (लीफ़ क्रिंकल वायरस)

वाइरस

ULCV


संक्षेप में

  • तीसरा त्रिकोणीय पत्ता आकार में बढ़ जाता है और हल्के हरे रंग का हो जाता है.
  • पत्तियां सिकुड़न और झुर्रियों के लक्षण दिखाती हैं और खुरदुरी और चमड़े जैसी बन जाती हैं.
  • संक्रमित पौधे बाद में पुष्पक्रम की विकृति और अवरुद्ध विकास दिखाते हैं.
  • फली और बीज के बनने में गंभीर रूप से कमी दिखाई देती है, जिसके परिणामस्वरूप भारी उपज हानि होती है।.
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लक्षण

संक्रमित बीज से विकसित पौधों के तीसरे त्रिकोणीय पत्ते सामान्य से अधिक बड़े होते हैं। ये पत्ते सामान्य से अधिक हल्के हरे रंग के होते हैं। एक विशेष लाल रंग के मलिनकिरण के साथ डंठल छोटे और पत्तियों की शिराएं मोटी हो सकती हैं। रोपण के एक महीने बाद, पत्तियों का सिकुड़ना और झुर्रीदार होना शुरू हो जाता हैं, और वे खुरदुरी और चमड़े जैसी बन जाती हैं। बाद के विकास चरणों के दौरान, कीट रोगवाहकों से संक्रमित पौधों में आमतौर पर युवा पत्तियों में लक्षण दिखते हैं, जबकि पुरानी पत्तियाँ लक्षण रहित रहती हैं। पत्तियां शिराओं की विशिष्ट हरित हीनता दिखाती हैं, और फूल विकृत होते हैं। छोटी कलियां और अवरुद्ध विकास देखा जा सकता है। जो भी उत्पादक फूल बचे हुए होते हैं, वे फीके पड़ जाते हैं और बीज बड़े आकार के हो जाते हैं। पराग उर्वरता और फलियाँ गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारी उपज हानि होती है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

वायरस अक्सर बीजों से पैदा होता है, जो अंकुरों में प्राथमिक संक्रमण की उपस्थिति का कारण बनता है। पौधे से पौधे का द्वितीयक संक्रमण उन रोगवाहक कीटों के माध्यम से होता है, जो पौधों के रस को पीते हैं, जैसे एफ़िड की कुछ प्रजातियां (उदाहरण के लिए, एफ़िस क्रेसीवोरा और ए. गॉस्सीपी), एक सफ़ेद मक्खी (बेमिसिया तबाच्ची) और एक पत्ती पर भोजन करने वाला भृंग (हेनोसेपिलाच्ना डोडेकास्टिग्मा)। वायरस के फैलाव की मात्रा और रोग की गंभीरता पौधों की सहिष्णुता, खेतों में रोगवाहक की मौजूदगी और प्रचलित जलवायु परिस्थितियों द्वारा निर्धारित होती है। संक्रमण के समय के आधार पर, वायरस अनाज की उपज 35 से 81% तक कम कर सकता है।

जैविक नियंत्रण

विभिन्न जैविक साधन संक्रमण को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। स्यूडोमोनस फ्लोरेसेन्स नस्लों के मिट्टी या पत्तियों पर किए जाने वाले स्प्रे रोगवाहक आबादी को नियंत्रित करने में मदद कर सकते हैं। यह पाया गया है कि ताज़ी छाछ और कैसीन का बीमारी के फैलाव पर प्रभाव पड़ता है। मिराबिलिस जलापा, कैथारेंथंस रोज़ियस, दटुरा मेटल, बोगनविल्लिया स्पेक्टाबिलिस, बोरेहाविया डिफ़ुसा और एज़ाडीरेक्टा इंडिका का खेत में वायरस की उपस्थिति पर प्रभाव पड़ता है।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हो, तो हमेशा निवारक उपाय और जैविक उपचार के एकीकृत दृष्टिकोण पर विचार करें। विषाणु के खिलाफ़ कोई रासायनिक उपचार उपलब्ध नहीं है, लेकिन रोगवाहक आबादी को नियंत्रित करने के लिए प्रणालीगत कीटनाशकों का उपयोग किया जा सकता है। आमतौर पर इमिडाकलोप्रिड 70 डब्ल्यू एस @5 मिली./किग्रा. से बीज लेपन की सलाह दी जाती है। डायमेथोएट पर आधारित कीटनाशकों का पत्तियों पर छिड़काव के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यौगिक 2,4-डिक्सोहेक्साहाइड्रो 1,3,5-ट्राइज़ीन (डीएचटी) विषाणु के फैलाव में बाधा डालता है और इसकी ऊष्मायन अवधि को बढ़ाता है।

निवारक उपाय

  • स्वस्थ पौधों से बीज या प्रमाणित रोगजन-मुक्त बीज उपयोग करें.
  • आपके क्षेत्र में उपलब्ध सहिष्णु या प्रतिरोधी किस्में लगाएं.
  • रोगवाहकों के किसी भी लक्षण के लिए अपने पौधों या खेत की निगरानी करें.
  • संक्रमित दिखने वाले पौधों को निकालें और उन्हें मिट्टी में दबा दें.
  • अपने खेतों के पास अत्यधिक खर-पतवार का विकास (खरपतवार वैकल्पिक धारक के रूप में काम कर सकते हैं) रोकें.
  • रोग के प्रसार को कम करने के लिए मकई, ज्वार और मोती बाजरा जैसी बाधित करने वाली फसलों का उपयोग करें.
  • कटाई के बाद पौधों के मलबे को हटाएं और जलाएं.
  • ऐसी फसलों के साथ चक्रीकरण करें (क्रॉप रोटेशन), जो रोगवाहक के प्रति संवेदनशील न हों।.

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