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कसावा का भूरी धारियों वाला रोग

वाइरस

CBSV


संक्षेप में

  • शिराओं की विशेष पीली या परिगलित धारियां, जो बाद में आपस में मिल कर बड़े धब्बे बन जाती हैं.
  • कन्दों के अंदर गहरे भूरे क्षेत्र विकसित हो जाते हैं.
  • रोग की आरंभिक अवस्था में कभी-कभी छोटे तनों पर भूरे घाव दिखाई देते हैं।.
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लक्षण

रोग के लक्षण कसावा की प्रजातियों और मौसम की परिस्थितियों केअनुसार बदलते हैं, जिसके कारण इसकी पहचान मुश्किल होती है। आरंभिक लक्षण भूरे घाव या धारियाँ हो सकते हैं जो कभी-कभी नए हरे तने पर दिखाई देते हैं। हालांकि, अधिक प्रचलित और अधिक स्पष्ट लक्षण है पत्तियों के पटल पर शिराओं की विशिष्ट पीली या परिगलित धारियाँ। हरितहीनता बाद में बढ़कर अपेक्षाकृत बड़े, पीले धब्बे बना सकती है। बाद के चरण में, पूरी पत्ती हरितहीन हो सकती है और पर्णपात होता है। सामान्यतः बढ़ती हुई, अपरिपक्व पत्तियों के बजाय परिपक्व या लगभग परिपक्व पत्तियाँ प्रभावित होती हैं। जड़ों के आकार में आमतौर पर कमी आती है और कन्दों में गहरे भूरे परिगलित क्षेत्र विकसित हो जाते हैं। जड़ों में घाव होने के कारण कटाई के बाद फसल को क्षति हो सकती है। पत्तियों तथा/अथवा तनों पर लक्षण कन्दों के लक्षणों के बिना भी हो सकते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

लक्षणों का कारण कसावा की भूरी धारियों वाला जीवाणु (ब्राउन स्ट्रीक वायरस) है, जो सिर्फ कसावा और रबर का उत्पादन करने वाले संबंधित पौधे (सिएरा रबर वृक्ष) को संक्रमित करता है। ब्राउन स्ट्रीक वायरस घुनों और एफिड के साथ-साथ सफेद मक्खी, बेमिसिया टेबेकी, के द्वारा भी प्रसारित हो सकता है। लेकिन, रोग के प्रसार का प्रमुख तरीका मनुष्यों द्वारा संक्रमित कलमों का परिवहन और खेतों में स्वच्छता की कमी है, उदाहरण के लिए, कृषि उपकरणों के उपयोग के द्वारा। कसावा की प्रजातियों में अपनी संवेदनशीलता और संक्रमण के प्रति प्रतिक्रिया को लेकर बहुत अंतर होता है जिसमें संक्रमण के क्षेत्र और मौसम की परिस्थितियों के आधार पर उपज की 18 -70% की हानि होती है। संक्रमित कलमों के प्रभावित से अप्रभावित देशों, जहाँ यह रोग नहीं पहुँचा है, में परिवहन को सीमित करने के लिए क्वारन्टीन के उपाय किये जाने की आवश्यकता होती है।

जैविक नियंत्रण

पौधों को संक्रमित करने के बाद जीवाणु का कोई सीधा जैविक नियंत्रक नहीं है। रोग के प्रकोप को कम करने का एक तरीका कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से बचना है जो एफिड, घुनों और सफेद मक्खियों जैसे रोग के ज्ञात वाहकों के प्राकृतिक शत्रुओं के लिए हानिकारक हैं।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा एक समेकित दृष्टिकोण पर विचार करें जिसमें निरोधात्मक उपायों के साथ जैविक उपचार, यदि उपलब्ध हों, का समावेश हो। जीवाणु रोगों का उपचार रासायनिक प्रयोगों से नहीं किया जाता है। हालांकि, कीटनाशकों के उपयोग से सफेद मक्खी, घुन और एफिड जैसे रोगवाहकों की जनसंख्या को घटाया जा सकता है और रोग के प्रकोप को कम किया जा सकता है।

निवारक उपाय

  • प्रमाणित स्रोतों से लिये गए जीवाणु-मुक्त रोपण सामग्री के उपयोग का ध्यान रखें.
  • उन प्रजातियों को उगाएं जिनका कसावा की भूरी धारियों वाले रोग के विरुद्ध प्रतिरोधी या सहनशील होना सिद्ध हो.
  • कसावा के विकास के पहले 3 महीनों में खेतों की साप्ताहिक तौर पर निगरानी करें और रोगग्रस्त या विकृत पौधों को हटा दें.
  • खराब पौधों को तुरंत जला कर या गहराई में दबा कर नष्ट कर दें.
  • इस रोग को फैलाने वाले कीटों के वैकल्पिक मेज़बानों से बचने के लिए खेतों को खरपतवार से मुक्त रखें.
  • विभिन्न खेतों के मध्य काम करते समय कृषि औज़ारों को संक्रमणमुक्त करें.
  • कलमों को नए खेतों या इलाकों में नहीं ले जाएं।.

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