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पत्तियों पर कोणीय धब्बों वाला रोग (एंगुलर लीफ़ स्पॉट)

बैक्टीरिया

Pseudomonas syringae


संक्षेप में

  • पत्तियों पर छोटे गोल धब्बे जो बाद में बड़े, कोणीय से अनियमित, पानी भरे हुए हिस्से में बदल जाते हैं.
  • संक्रमित भाग भूरे हो जाते हैं, गिर जाते हैं और अनियमित छिद्र छोड़ जाते हैं.
  • फलों पर गोलाकार धब्बे, जो बाद में बदल कर सफ़ेद हो जाते हैं और चटक कर खुल जाते हैं।.
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लक्षण

आरम्भ में पत्तियों पर छोटे, गोल धब्बे दिखाई देते हैं। ये धब्बे बाद में बड़े, कोणीय से अनियमित, पानी भरे हुए हिस्से में बदल जाते हैं। नम मौसम में, पत्तियों के निचले भाग के धब्बों से जीवाणु-युक्त तरल पदार्थ की बूँदें रिसती हैं। शुष्क मौसम में, इन बूंदों की नमी समाप्त हो जाती है और एक सफ़ेद परत बन जाती है। बाद में, संक्रमित भाग परिगलित हो जाता है और भूरा हो कर सिकुड़ जाता है तथा प्रायः पत्ती के स्वस्थ ऊतक से फट कर अलग होकर झड़ जाता है। इन घावों में प्रायः पीले किनारे होते हैं। बड़े, अनियमित छिद्र पत्तियों को खुरदुरा-सा दिखाते हैं। कुछ प्रतिरोधी प्रजातियों में घाव छोटे होते हैं तथा उनमें पीले किनारे नहीं होते हैं। संक्रमित फलों में छोटे, लगभग गोलाकार धब्बे दिखाई देते हैं जो कि सतही होते हैं। जब प्रभावित ऊतक मर जाते हैं, वे सफ़ेद हो जाते हैं और चटक कर खुल जाते हैं, जिससे अवसरवादी कवक और जीवाणु फैलते हैं और पूरे फल को सड़ा देते हैं। नए फलों में हुए संक्रमण से फलों के गिरने में अत्यंत वृद्धि हो जाती है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

ये लक्षण जीवाणु सुडोमोनास सीरिंज के कारण होते हैं, जो सभी खीरा परिवार की फसलों को संक्रमित कर सकता है। यह संक्रमित बीजों या मिट्टी में पौधों के अवशेषों में 2 वर्ष से अधिक समय तक जीवित रह सकता है। जब नमी अधिक होती है, तो संक्रमित हिस्से पर पारदर्शी से लेकर सफ़ेद रंग का चिपचिपा जीवाणु-युक्त तरल पदार्थ बनता है। ये जीवाणु कर्मियों के हाथों और उपकरणों, कीटों, पानी के छींटों या हवा की सहायता से एक पौधे से दूसरे पौधे तक पहुंचते हैं। अंततः, जीवाणु पौधों में पत्तियों की सतह पर स्थित छिद्रों (स्टोमेटा) से प्रवेश करते हैं। जब फल संक्रमित होते हैं, जीवाणु गूदे में अन्दर तक प्रवेश कर जाते हैं और बीजों को संक्रमित कर देते हैं। यह विचित्र बात है कि पत्तियों पर टोबेको नेक्रोसिस विषाणु का संक्रमण कुछ हद तक एंगुलर लीफ़ स्पॉट के जीवाणु के प्रति प्रतिरोध उत्पन्न करता है।

जैविक नियंत्रण

संक्रमित बुआई के सामानों को लहसुन तथा गर्म पानी के मिश्रण (50 डिग्री से.) में 30 मिनट तक डुबोना चाहिए। ग्रीनहाउसों में, रात के समय की नमी को डीह्यूमिडीफ़ायर से नियंत्रित करके (80-90% तक) एंगुलर लीफ़ स्पॉट को रोका जा सकता है। जैविक नियंत्रक, पेंटाफेज, पी. सीरिंज को प्रभावी रूप से नियंत्रित करता है। जैविक कॉपर कवकरोधक रोग के फैलाव को कम कर सकते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हो, तो जैविक उपचार के साथ निवारक उपायों के एकीकृत दृष्टिकोण पर हमेशा विचार करें। कॉपर हाइड्रोक्साइड वाले कीटनाशकों का प्रयोग किया जा सकता है। यह उपचार तब अधिक कारगर होता है जब तापमान 24 डिग्री से अधिक हो और पत्तियां नम हों। किसी गर्म दिन में, जब पत्तियां सूखी होती हैं, छिड़काव करने पर पौधों को हानि पहुँच सकती है। रोग का नियंत्रण करने के लिए साप्ताहिक रूप से छिड़काव आवश्यक है।

निवारक उपाय

  • स्वस्थ पौधे या प्रमाणित स्त्रोत से प्राप्त बीजों का प्रयोग करें.
  • यदि उपलब्ध हों, तो प्रतिरोधक प्रजातियाँ चुनें.
  • स्प्रिंकलर के बजाय हल रेखा विधि से सिंचाई करें और आवश्यकता से अधिक पानी न दें.
  • अच्छी जलनिकासी वाली भूमि चुनें.
  • ऐसे खेतों में फसल को, बीजों तथा फलों, दोनों के उत्पादन के लिए लगाएं, जिनमें कम से कम 2 वर्षों तक कोई क्युकर्बिट्स न उगाए गए हों.
  • संक्रमित क्षेत्र में, क्युकर्बिट्स को कम से कम 3 वर्षों तक न लगायें.
  • संक्रमित अथवा संदेहास्पद पौधों की सामग्री (उदाहरण, झुलसे हुए) को हटा कर नष्ट कर दें.
  • रोग के लक्षणों के लिए खेतों की नियमित निगरानी करें.
  • खेतों में काम करने के बाद औज़ारों को अच्छी तरह साफ़ करें।.

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