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कनेर शल्क

कीट

Aspidiotus nerii


संक्षेप में

  • मेज़बान पौधे के तने, पत्तियों और फलों पर कवच जैसे कई सफ़ेद शल्कों की मौजूदगी.
  • पत्तियाँ और फल मटमैले रंग की फफूंदी से ढंक जाते हैं.
  • पत्तियां मुरझा और समय से पहले झड़ जाती हैं.
  • फलों में विकृति।.
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लक्षण

कनेर शल्क मेज़बान पौधे के कई भागों पर पलता है और इसके लक्षण आम तौर पर हमले की विकटता पर निर्भर करते हैं। प्रकोप के पहले संकेत मेज़बान पौधे के तने, पत्तियों और फलों पर कवच जैसे असंख्य सफ़ेद शल्क (लगभग 2 मिमी व्यास) की मौजूदगी है। खाने के साथ-साथ ये मधुरस बनाते हैं जो फलों और पत्तियों पर टपकता है और राख जैसी फफूँदी के विकास को बढ़ावा देता है। अत्यधिक प्रकोप होने पर पत्तियां मुरझा जाती हैं और असमय गिर सकती हैं। टहनियाँ सूख जाती हैं और फलों में विकृति दिखाई देती है। ऐसा जैतून के मामले में बहुत गंभीर होता है। अंत में, पेड़ों की बढ़वार और उपज घट जाती है और गुणवत्ता प्रभावित होती है।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

लक्षण कनेर शल्क, एस्पिडियोटस नेरी के खाने के कारण होते हैं। वयस्क चपटे और अंडाकार, लंबाई में लगभग 2 मिमी और सफ़ेद रंग के होते हैं जो पानी से बचाने वाली मोमदार परत से ढंके होते हैं। अवयस्क अवस्थाएं (रेंगने वाले कीट) बहुत छोटे आकार की होती हैं। दोनों ही पत्तियों और तनों की निचली सतह पर पपड़ी की तरह जमे रहते हैं और पौधे का रस चूसते हैं। शल्कों का लंबी दूरी तक फैलाव प्रमुख रूप से संक्रमित पौध सामग्री से होता है। स्थानीय रूप से, रेंगने वाले कीट बहुत सक्रिय और गतिशील होते हैं और संपर्क में आने वाली शाखाओं से एक से दूसरे पेड़ पर पहुंच जाते हैं। तापमान और नमी का इनके जीवन-चक्र पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। 30 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर रेंगने वाले कीटों का विकास पूरी तरह बाधित हो जाता है। जैतून के बाग़ानों में आम तौर पर ए. नेरी को मामूली कीट माना जाता है। अन्य मेज़बानों में सेब, आम, ताड़ के पेड़, और नींबू परिवार के पेड़ हैं।

जैविक नियंत्रण

ए. नेरी के कुदरती शत्रुओं में कीट-परजीवी एफ़ाइटस मेलिनस और एफ़ाइटिस चिलेंसिस, और किलोकोरस बाइपुस्टुलेटस, राइज़ोबियस लोफांटे और किलोकोरस कुवाने जैसे कॉकीनेलिड शिकारी शामिल हैं। किलोकोरस कोवाने धूप की बहुलता वाले अत्यधिक प्रकोपित स्थानों पर शल्कों को नियंत्रित करने में अधिक कारगर हैं। वनस्पति तेल, वनस्पति सत, फ़ैटी एसिड या पायरेथ्रिन पर आधारित कम देर तक प्रभावी जैविक कीटनाशकों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। बार-बार इस्तेमाल आवश्यक हो सकता है और पत्तियों की निचली सतह को लक्ष्य बनाया जाना चाहिए।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा एक समेकित नज़रिये से रोकथाम उपायों के साथ-साथ उपलब्ध जैविक उपचारों, यदि उपलब्ध हों, को अपनाएं। डेल्टामेथ्रिन, लैम्ब्डा-साईहेलोथ्रिन या साइपरमेथ्रिन सक्रिय तत्व युक्त संपर्क में आने वाले छिड़कावों का पत्ती की निचली सतह पर अच्छी तरह से छिड़काव करने से कुछ हद तक नियंत्रण पाया जा सकता है। पौधों के ऊतक प्रणालीगत कीटनाशक एसिटेमप्रिड को सोख लेते हैं और खाने की प्रक्रिया के दौरान यह शल्कों द्वारा खाए जाते हैं। ध्यान रखें कि मृत शल्क पत्तियों और तनों से अच्छी तरह चिपके रह सकते हैं।

निवारक उपाय

  • रोपण के समय पेड़ों के बीच पर्याप्त स्थान रखें.
  • पेड़ों की शाखाओं को संपर्क में आने से रोकने के लिए पेड़ों की ज़रूरत अनुसार छँटाई करें.
  • बाग़ान में शल्क की मौजूदगी की निगरानी करें और कम संख्या में होने पर उन्हें पत्तियों से खुरचकर हटा दें.
  • सभी प्रकार की आयातित प्रवर्धन सामग्री में शल्क की उपस्थिति की सावधानी से जांच करें.
  • संभावित संक्रमित सामग्री को एक से दूसरे स्थान पर ले जाने से बचें.
  • व्यापक प्रभाव वाले कीटनाशकों के इस्तेमाल से बचें क्योंकि इससे लाभप्रद कीटों को नुकसान पहुंच सकता है.
  • अत्यधिक संक्रमित पेड़ों को हटाने और उनके स्थान पर अन्य पेड़ों को लगाने पर विचार करें.
  • शल्कों को बढ़ावा देने वाली चींटियां पकड़ने या उनका रास्ता रोकने के लिए जाल या अवरोधक लगाएं।.

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