- केला

केला केला

केले का पपड़ी पतंगा

कीट

Nacoleia octasema


संक्षेप में

  • बाहर निकलने के समय लार्वा बौर और बढ़ रहे फलों को खाते हैं.
  • कुछ मामलों में नर बौर या पकते फलों पर भी हमला होता है.
  • फलों की बाहरी सतह पर पपड़ी पड़ने से वे बाज़ार में बेचे जाने लायक नहीं रहते।.
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लक्षण

केले के पपड़ी पतंगों से क्षति आम तौर पर लार्वा अवस्था के कारण होती है और यह मुख्यतः फलों तक ही सीमित रहती है। लार्वा सह पत्र से सुरक्षित फलों के गुच्छों को लक्ष्य बनाते हैं। बाहर निकलने पर वे बौर और बढ़ रहे फलों को खाना शुरू करते हैं, जिससे उन्हें बाहरी रूप से नुकसान पहुंचता है और उन पर धब्बे पड़ते हैं जो जल्द ही काले पड़ जाते हैं। समय के साथ, जैसे-जैसे सह पत्र हटने और झड़ने लगते हैं, ये गुच्छे के नीचे नए और अब तक सुरक्षित फलों पर पहुंच जाते हैं। यदि कोई विकल्प नहीं मिलता है तो लार्वा गुच्छों के आधार पर नर पुष्पगुच्छों और पकते हुए फलों को खाते रहते हैं। इन स्थानों पर प्रायः एक पारदर्शी जेली जैसा पदार्थ मौजूद होता है जो सिर्फ केले के पपड़ी पतंगा के खाए जाने से ही बनता है। फलों की बाहरी सतह पर पपड़ी पड़ने से वे बाज़ार में बेचे जाने लायक नहीं रहते।

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ट्रिगर

क्षति केले के पपड़ी पतंगा नैकोलिया ऑक्टैसेमा के कारण होती है। वयस्क हल्के कत्थई से लेकर पीलापन लिए हुए कत्थई होते हैं जिनके पंखों पर काले चिन्ह होते हैं। यह अल्पायु पतंगे (4-5 दिन) संध्या में सक्रिय होते हैं और शाम ढलने से पहले मिलन करते हैं। दिन में ये कूड़े और पुरानी पत्तियों के आधार में छिपे रहते हैं। मादाएं नए निकलते हुए गुच्छों या उसके पास की पत्तियों और सह पत्रों पर अंडे देती हैं। अण्डों से निकलने के बाद लार्वा गुच्छों तक अपना रास्ता तलाश लेते हैं और उन्हें खाना शुरू कर देते हैं। अंडों से निकलने से लेकर अंडे देने तक का जीवन चक्र 28 दिनों में पूरा होता है। केले के पपड़ी पतंगा के लिए नम और गर्म हालात अनुकूल होते हैं जिस के कारण नम मौसम में सर्वाधिक क्षति होती है। यदि बेमौसम वर्षा न हो तो अपेक्षाकृत ठन्डे और सूखे सर्दी के महीने इन कीटों से मुक्त होते हैं। शोध से पता चलता है कि कम नमी और शुष्क परिस्थितियों में वयस्क मिलन नहीं करते और अंडे नहीं देते। यह केले को आर्थिक रूप से सर्वाधिक क्षति पहुँचाने वाले कीटों में से एक है और यदि इन पर नियंत्रण न पाया जाए तो गुच्छों को 100% तक क्षति पहुंचाते हैं।

जैविक नियंत्रण

इस कीट के विरुद्ध कोई भी प्रमुख परजीवी या शिकारी नहीं पहचाना गया है। कुछ परजीवी ततैया, मकड़ियाँ तथा अन्य सामान्य शिकारी थोड़ा-बहुत कुदरती नियंत्रण प्रदान करते हैं। आम तौर पर पौधों और गुच्छों पर पाई जाने वाली टेट्रामोरियम बाईकेरिनेटम चींटी केले के पपड़ी पतंगा पर कुछ हद तक नियंत्रण करती है। स्पाइनोसैड के मिश्रण वाले जैव-कीटनाशक, कवक बोवारिया बैसिआना या मेटाराइजियम एनीसॉप्लि या जीवाणु बैसिलस थुरिंजिएंसिस भी प्रभावी हो सकते हैं।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा एक समेकित नज़रिये से रोकथाम उपायों के साथ-साथ उपलब्ध जैविक उपचारों को अपनाएं। क्लोरोपायरिफास, बाईफेंथ्रिन और बेन्डियोकर्ब के सक्रिय तत्वों पर आधारित मिश्रण का गुच्छों में इंजेक्शन लगाने की सलाह दी जाती है। इस उपचार का तभी इस्तेमाल किया जाना चाहिए जब गुच्छा पौधे से निकलकर सीधा ऊपर की ओर हो। गुच्छे के शीर्ष से लगभग एक तिहाई हिस्से नीचे तनु कीटनाशक की उचित खुराक का 20 से 40 मिली. का इंजेक्शन लगाना चाहिए। इससे ऊपर या नीचे इंजेक्शन लगाने पर या तो फल को क्षति पहुंचेगी या यह निष्प्रभावी रहेगा।

निवारक उपाय

  • यदि उपलब्ध हों तो प्रतिरोधी किस्मों का चुनाव करें.
  • लार्वा की मौजूदगी और उसके कारण होने वाली क्षति के लिए नए निकले गुच्छों की निगरानी करें.
  • गुच्छे के डंठल के आधार पर विशेष ध्यान दें और वहाँ पर पारदर्शी जेली जैसे पदार्थ की मौजूदगी जांचें।.

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