- सिट्रस (नींबू वंश)

सिट्रस (नींबू वंश) सिट्रस (नींबू वंश)

काले पार्लेटोरिया शल्क

कीट

Parlatoria ziziphi


संक्षेप में

  • बहुत छोटे, काले शल्कों की उपस्थिति जो पत्तियों, फलों तथा टहनियों को ढक लेते हैं.
  • पर्णदल तथा फलों पर पीले छींटे तथा धब्बे.
  • गंभीर मामलों में पतियों का असमय झड़ना।.
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सिट्रस (नींबू वंश) सिट्रस (नींबू वंश)

लक्षण

पी. ज़िज़िपी के संक्रमण की विशेषता बहुत छोटे, काले कीटों की उपस्थिति है जो टहनियों, पत्तियों तथा फलों पर पलते हैं। अत्यधिक संक्रमण होने पर, इन्हें बिल्कुल हटाया नहीं जा सकता है, और ये आयताकार काले शल्क तथा उनके सफ़ेद रेंगने वाले जीव फलों, पत्तियों तथा टहनियों को पूर्ण रूप से ढक लेते हैं। पौधे का रस कम होने के कारण उसकी जीवन शक्ति कम जाती है तथा खाए जाने वाले स्थानों पर पीले धब्बे या छींटे विकसित हो जाते हैं। इसके खाने से शाखाएं मर जाती हैं तथा फलों के विकास पर गंभीर प्रभाव पड़ता है जिसके कारण प्रायः फल विकृत हो जाते हैं। इसके कारण पौधा समय से पहला बूढ़ा हो जाता है, पत्तियों तथा फल झड़ जाते हैं, तथा फलों की संख्या तथा गुणवत्ता में कमी आती है। यह प्रजाति साइट्रस की सबसे महत्वपूर्ण कीट बन गई है।

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ट्रिगर

लक्षण शल्क पार्लेटोरिया ज़िज़िपी के कारण होते हैं, जिसके धारक प्रमुखतः साइट्रस प्रजाति होती हैं। हालाँकि, पत्तियाँ बसावट का प्रमुख स्थान होती हैं, लेकिन यह फलों तथा शाखाओं पर भी बसता तथा पलता है। विकास की सभी अवस्थाएं पूरे वर्ष भर देखी जाती हैं, जिससे यह पता चलता है कि कीट वार्षिक स्तर पर कई अतिव्यापी पीढ़ियाँ, दो से ले कर सात तक, उत्पन्न करता है। यह संख्या काफी सीमा तक साइट्रस उत्पादन के क्षेत्रों पर निर्भर करती है। सिसिली में अनुकूल परिस्थितियों में जीवन चक्र पूर्ण करने में 30-40 दिन लगते हैं, जबकि ट्युनिसिया में अपेक्षाकृत ऊष्ण परिस्थितियों में यह 70- 80 दिनों का समय लेते हैं तथा शीत परिस्थितियों में 160 दिन तक लेते हैं।

जैविक नियंत्रण

कुटेलिस्टा केरुलिया, डाईसिनर्वस एलिगेंस तथा मेटाफ़ाइकस हेल्वोलस जैसे कुछ परजीवी कीट के साथ जेनरा एस्पिडियोटिफ़ेगस तथा एफ़ाइटिस की कुछ प्रजातियाँ भी पी. ज़िज़िपी को नियंत्रित करने में सहायक होती हैं। शिकारी जैसे कि लेडीबर्ड (चिलोकोरस बाईपुस्टुलेटस या सी. निग्रिटा, लिंडोरस लोफ़ांथे तथा ओरकस चेलिबियस) सही परिस्थितियों में काले शल्कों की जनसंख्या को नष्ट कर सकते हैं। काले शल्कों को नियंत्रित करने के लिए कनोला तेल या कवकीय स्त्रोतों के जैव-कीटनाशकों का प्रयोग भी किया जा सकता है। सफ़ेद तेल के मिश्रण (उदाहरण के लिए, 4 भाग वनस्पति तेल में एक भाग बर्तन साफ़ करने का डिटर्जेंट) का काले शल्कों के विरुद्ध प्रभावी रूप से प्रयोग किया जा सकता है जिसका पारिस्थितिकी रूप से महत्वपूर्ण अन्य कीटों पर हल्का प्रभाव होता है।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा समवेत उपायों का प्रयोग करें जिसमे रोकथाम के उपायों और जैविक उपचार, यदि उपलब्ध हों, का समावेश होना चाहिए। काले शल्कों का उपचार प्रथम पीढ़ी के रेंगने वाले जीवों पर पुष्पीकरण के बाद तथा गर्मियों में छिडकाव के मध्य नियोजित किया जाना चाहिए। ओर्गेनोफोस्फेट या मैलाथियोन, डाईमैथोएट या पैराथियोन वाले तेल के छिड़काव के प्रयोग की सलाह दी जाती है, किन्तु इसका उपयोग सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए क्योंकि इससे शिकारी कीटों पर भी प्रभाव पड़ता है।

निवारक उपाय

  • शल्कों के संक्रमण के लिए पेड़ों की नियमित निगरानी करें.
  • हल्के संक्रमण की अवस्था में, पौधे के भागों को हाथों से हटाना अथवा कीटों को कुचल देना प्रभावी होता है.
  • पेड़ों के संक्रमित भागों को हटा कर बागान से दूर जला दें अथवा गहराई में दबा दें.
  • पौधों के मध्य संपर्क रोकने तथा छतरी में हवा के प्रवाह को बेहतर करने के लिए समुचित छंटाई करें.
  • संक्रमण की संभावित सामग्री के परिवहन से बचें.
  • प्राकृतिक निवासी शत्रुओं को सुरक्षित रखने के लिए परिदृश्य में वृहद् विस्तार वाले हठी कीटनाशकों का प्रयोग न करें।.

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