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दीमकें

कीट

Termitidae


संक्षेप में

  • नवोदित और पुराने पौधों का शिथिल होना और बहुधा (दीमकों का) ठिकाना बना लेना.
  • दीमकों का उपस्थित होना तथा गहरे छिद्रों में चारों और एवं जड़ों में होना.
  • जड़ों और तनों के आधार (दीमकों द्वारा) खोखलें कर दिये जाते हैं।.
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लक्षण

दीमकें पौधों की बढ़त की सभी अवस्थाओं, बीजरोपण से पौधों के परिपक्व होने तक पौधों पर हमला कर सकती है। वे जड़ों को नुकसान करती है जिसे पौधों के उपरी हिस्सों तक सर्वप्रथम पौधों पर शिथिलन के रूप में देखा जा सकता है। दीमकों की उपस्थिति को सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रभावित पौधों को उखाड़ दें और जड़ों तथा निचले तनों में जीवित दीमकों का अथवा गहरें छिद्रों की उपस्थिति का निरीक्षण करें। पौधों की जड़ें व तनें पूर्णतया खोखले और मिट्टी के अपशिष्ट से भरे हो सकते है। कुछ पौधे तेज हवा में भी टिके रहते है और अकसर मिट्टी से ढके रहते हैं जिसके नीचें दीमक पायी जा सकती हैं। सुबह के समय जल्दी और देर शाम को पौधों का निरीक्षण करना चाहिए क्योकि दीमक दिन के समय जब तापमान बढता है तो मिट्टी में अधिक गहराई में जा सकती हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

दीमकें बड़ें गुटों में रहती हैं जिसमें कई कार्यकर्ता , सैनिक और प्रजननकर्ताओं के रूप होते हैं। कभी कभी इनके घोसलें काफी विस्तृत होते है। कुछ नम मृत पौधों की ठूंठ पर घोसले बनाते हैं , जबकि अन्य गुप्त रूप से घोसलों का निर्माण करते है। वे घोसलों से भक्षण करते है, जोकि पौधों की जड़ों और दूसरें ठोस माध्यमों से आन्तरिक गहरें छिद्रों द्वारा संरक्षित कियें गयें होते है। यदि खाना उपलब्ध नही हो तो ये पौधों पर भी हमला कर सकते है, इसलिए सुनिश्चित करें कि मिट्टी में काफी मात्रा में कार्बनिक यौगिक हो। प्रजननीय दीमक पंखों वाली होती है। सामानयता नर व मादा गहरे रंग के बहुत अधिक संख्या में और अच्छी तरह विकसित आंखों वाली होती हैं और एकजुट रूप से उत्पन्न होती है। इनका जमाव अकसर संध्या काल में काफी वर्षा के बाद होता है। उड़नें के बाद वे अपने पंखों और साथी को छोड़ देते हैं, और गहरा बिल खोदकर जमीन के छिद्रों और लकडी की दरारों में नये गुट बनाने हेतु घुस जाती है।

जैविक नियंत्रण

निमोटोड आधारित तैयारी ,दीमकों पर हमला करके इस कीट के खिलाफ प्रभावशाली सिद्ध होती है। द्रव जिसमें वेउवेरिया वारियाना कवक या मेटरहीजीयम उपस्थित होता है जब वे दीमकों के ढेर पर उपयोग करने पर प्रभावशाली साबित होती है। पुनरूत्पादक कवक इन्हें दूर भगानें का काम कर सकती है। नीम के बीज के गूदें से निकाले गये रस (एनएसकेई) को दीमक के खिलाफ पेड़ों और खेतो में फसलों पर उपयोग करने से बेहतर परिणाम मिलते हैं । दूसरा उपाय लकड़ी की राख को या उलेड़ना या कूटी हुई नीम की पत्तियों अथवा बीजों को दीमकों द्वारा किये गयें छिद्रों में डालकर इन्हें रोका जा सकता है।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हो तो हमेशा रक्षक उपायों के साथ साथ जैविक उपचारों को एकीकृत रूप से अपनायें। क्लोरीरिफोस, डेल्टामिथेन अथवा इमीडाक्लोप्रराइड पर आधारित उत्पादों को दीमकों के घोसलों में द्रव के तौर पर सुई से भीतर डाल देना चाहिए।

निवारक उपाय

  • जब रोपण करें तो खुले हुई, शुष्क मिट्टी जिसमें कम अपशिष्ट और कार्बनिक तत्व हो, उनके प्रयोग से बचें.
  • पौधों का सुबह जल्दी और दोपहर को देर से निरीक्षण करते रहें.
  • प्रभावित पौधों और पौधों के हिस्सों को हटा दें और नष्ट कर दें.
  • पौधों की बढ़त स्वस्थ रूप से हो उसके लिए उपयुक्त स्थितियों कों बढ़ावा दें.
  • प्रभावित पौधों को अनावश्यक क्षति और जल प्रतिबल से बचायें.
  • उपज को यदि सम्भव हो तो जल्दी ही काट लें क्योंकि दीमक खेतों में छोड़ी गयी परिपक्व फसल पर अकसर हमला करती है.
  • उपज कटने के बाद पौधों के अपशिष्ट को और अवशेषों को हटा दें.
  • दीमकों के घरोंदों और गहरे छिद्रों को नष्ट करने के लिए जुताई करें और ताकि परजीवियों जैसे चींटियां, चिड़िया, चूजे इत्यादि को वे दिखाई पड़ने लगे.
  • फसल चक्र या खेतों में अंतर-फसल को अपनायें।.

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