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चुकंदर का सैनिक कीट

कीट

Spodoptera exigua


संक्षेप में

  • इल्लियां रात में सक्रिय रहती हैं और वे समूह बनाकर पत्तियों को खाती हैं.
  • नए अंकुर मर सकते हैं जबकि यदि संक्रमण गंभीर न हो तो वयस्क पौधों के पुनः स्वस्थ होने की अच्छी संभावना रहती है.
  • अनेक प्राकृतिक शत्रु इस कीट के संक्रमण को सीमित करने में सहायक होते हैं।.
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लक्षण

आरंभ में छोटे लार्वा निचली छतरी में पुरानी पत्तियों की निचली सतह पर समूह में भक्षण करते हैं। बड़े लार्वा अधिक अकेले काम करना शुरू कर देते हैं और पत्तियों पर अनियमित छिद्र छोड़ते हुए पूरी फसल में फैल जाते हैं। वयस्क लार्वा छोटे पौधों में पूर्ण रूप से पर्णपात कर सकते हैं अथवा पत्तियों का कंकालीकरण होता है, अर्थात शिराओं के अतिरिक्त सभी ऊतकों को खा लिया जाता है। यदि पत्तियाँ कम पड़ जाती हैं, तो इल्लियाँ फलियों पर आक्रमण करती हैं किंतु तने उनका भोजन नहीं हैं। आमतौर पर, ये रात में भक्षण करती हैं और दिन में भूमि पर या पौधौं के छायादार या नम हिस्सों में छिपी रहती हैं। स्पोडोप्टेरा एक्सीगुआ की भक्षण की क्रिया से छोटे पौधे मर सकते हैं, किंतु पुराने पौधों में यदि संक्रमण गंभीर न हो तो वे पुनः स्वस्थ भी हो सकते हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

क्षति चुकंदर के सैनिक कीट (आर्मीवॉर्म), स्पोडोप्टेरा एक्सीगुआ के लार्वा के कारण होती है। यह कीट एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप के गर्म हिस्सों के साथ-साथ ठंडे मौसम के ग्रीनहाउसों में भी पाया जाता है। ये विभिन्न फ़सलों को संक्रमित करते हैं, जिनमें कपास, चुकंदर और मक्का शामिल हैं। वयस्क कीट भूरे-कत्थई रंग के होते हैं। सामने के पंख धब्बेदार कत्थई और भूरे होते हैं, जिनके मध्य में फली की आकृति का हल्के रंग का धब्बा होता है। पीछे के पंख भूरे या सफे़द रंग के होते हैं, जिनके किनारों पर गहरे रंग की रेखा होती है। मादाएं पत्तियों की निचली सतह पर समूह में अंडे देती हैं, जो सफे़द या भूरे बालों से ढके होते हैं। छोटे लार्वा हरे-कत्थई रंग के होते हैं और उनकी पीठ पर गहरी लंबवत धारियाँ होती हैं। वयस्क लार्वा हरे रंग का होता है, जिसके प्रत्येक पार्श्व भाग पर एक विशिष्ट पीली धारी और पीठ पर चौड़ा पीले-हरे रंग का छल्ला होता है।

जैविक नियंत्रण

एस. एक्सीगुआ की जनसंख्या कम करने का सबसे महत्वपूर्ण एक नियम इसके प्राकृतिक शत्रुओं को बढ़ावा देना है। फूलों के घुन (एंथोकोरिडे), अग्नि चींटियां, परजीवी कीट (हाइपोसोटर डिडायमोटर), मखियाँ और मकड़ी अंडे और लार्वा पर आक्रमण करते हैं। एंटोमोपैथोजेनिक कवक, बैसिलस थुरिजियेंसिस, एन पी वी तथा सूत्रकृमि लार्वा और वयस्कों को संक्रमित करते हैं। ताज़े नीम, नींबूघास और अदरक पर आधारित वानस्पतिक कीटनाशक भी प्रभावी होते हैं। इसी तरह, अंडों तथा छोटे लार्वा दोनों को 5% कपास के बीजों के तेल का पत्तियों पर छिड़काव कर नियंत्रित किया जा सकता है। संसर्ग बाधित करने और प्रजनन बाधित और रद्द करने के लिए फ़ेरोमोन जाल का भी उपयोग ( 97% कुशलता के साथ) किया जा सकता है।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा निरोधात्मक उपायों के साथ, यदि उपलब्ध हों, तो जैविक उपचारों के समन्वित दृष्टिकोण पर विचार करना चाहिए। कीटाणुनाशकों के उपयोग की सलाह नहीं दी जाती हैं, क्योंकि ये लाभप्रद कीटों और एस. एक्सीगुआ के प्राकृतिक शत्रुओं को मार देते हैं, जिसके कारण असलियत में इस कीट का प्रकोप बढ़ सकता है। साथ ही, इस कीट में अनेक रसायनों के प्रति प्रतिरोध उतपन्न करने की उच्च क्षमता देखी गयी है।

निवारक उपाय

  • कड़े ऊतकों वाली पत्तियों की प्रतिरोधक प्रजातियों को रोपण करें.
  • चरम जनसंख्या से बचने के लिए बुआई के समय को समायोजित करें.
  • कीट के चिन्हों के लिए अपने पौधों की नियमित, विशेषतः देर शाम और भोर में, निगरानी करें.
  • संक्रमण की निगरानी के लिए फ़ेरोमोन जाल का उपयोग करें.
  • खेतों में अथवा उसके आसपास खरपतवार हटाएं और कूड़ा फेंकने से बचें, क्योंकि ये कीट को पनपने के लिए स्थान और आश्रय देते हैं.
  • एक गहरी खाई खोदें और उसे पानी से भर दें जिसमें बगल के खेतों से आने वाली इल्लियाँ डूब जाएं.
  • व्यापक प्रभाव वाले कीटनाशकों का समुचित उपयोग करें क्योंकि ये प्राकृतिक शत्रुओं को मार सकते हैं.
  • अपने खेत में अच्छी तरह जुताई करें और पटरा चलाएं जिससे लार्वा और प्यूपा शिकारियों के समक्ष आ जाएं।.

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