मिर्च का तैला

  • लक्षण

  • ट्रिगर

  • जैविक नियंत्रण

  • रासायनिक नियंत्रण

  • निवारक उपाय

मिर्च का तैला

Scirtothrips dorsalis

कीट


संक्षेप में

  • नई पत्तियों पर हल्के भूरे से लेकर चांदी के रंग धब्बे पड़ जाते हैं और उनमें विकृति (मुड़ना) नज़र आती है या वे झड़ जाती हैं.
  • फूलों पर भोजन पंखुड़ियों पर धारियों के रूप में दिखता है और वे सूख और झड़ सकते हैं.
  • फलों पर पपड़ियां, धब्बे और विकृतियां उनकी बिक्री मूल्य को कम करती हैं।.

होस्ट्स:

शिमला मिर्च एवं मिर्च

लक्षण

डिंभ और वयस्क, दोनों ही नई पत्तियों की निचली सतह को खाते हैं। वे ऊतकों को छीलते और काटते हैं और निकलते हुए रस को चूसते हैं। संक्रमित पत्तियों पर हल्के भूरे से चांदी जैसे रंग के धब्बे उत्पन्न हो जाते हैं और विकृति (मुड़ने) के संकेत दिखा सकती हैं। बहुत गंभीर मामलों में, पत्तियां पूरी तरह विकृत हो जाती हैं और बाद में पौधा समय से पूर्व पतझड़ का शिकार हो जाता है। फूलों पर भोजन पंखुड़ियों पर धारियों के रूप में दिखता है और फूल सूख और झड़ जाते हैं। फलों पर पपड़ियां, धब्बे और विकृतियां उनकी बिक्री मूल्य को कम करती हैं। हालांकि संक्रमण वर्ष भर हो सकता है, लेकिन सूखे महीनों और नाइट्रोजन उर्वरक के अत्यधिक इस्तेमाल वाली मिट्टी में यह सर्वाधिक होता है।

ट्रिगर

लक्षणों का कारण तैला की दो प्रजातियाँ हैं, स्किर्टोथ्रिप्स डॉर्सेलिस और राइफ़िफ़ोरोथ्रिप्स क्रूएंटेटस। स्किर्टोथ्रिप्स डॉर्सेलिस का वयस्क भूसे जैसे पीले रंग का होता है। मादाएं प्रायः नई पत्तियों और कलियों के अंदर 50 भूरे-सफ़ेद रंग के फलियों के दाने जैसे अंडे देती हैं। जैसे-जैसे-जैसे आबादी बढ़ती है, ये पूर्ण विकसित पत्तियों की सतह पर आ जाते हैं। अण्डों के फूटने का समय 3-8 दिन का होता है। नए निकले हुए डिंभ बहुत छोटे, लाल रंग के शरीर वाले होते हैं, जो बाद में पीले-कत्थई रंग के हो जाते हैं। कायांतरण की प्रक्रिया में प्रवेश करने वाले डिंभ पौधों से गिर जाते हैं और अपना विकास ढीली मिट्टी या मेज़बान पौधे के आधार पर पत्तियों के अवशेषों में पूरा करते हैं। प्यूपीकरण अवधि 2-5 दिन की होती है। वयस्क आर. क्रूएंटेटस बहुत छोटे, पतले, कोमल काले-कत्थई शरीर वाले होते हैं और उनके पंख झालरदार, पीले-से होते हैं। इनकी लम्बाई 1.4 मिमी. होती है।

जैविक नियंत्रण

तैला पर विभिन्न जैविक नियंत्रक कारक, जैसे वंश ओरियस के छोटे पाइरेट बग और फ़ायटोसीड घुन नियोसेलस कुकुमरिस और एंबलायसेयस स्विर्सकी प्रभावी नियंत्रण प्रदान करते हैं। शिकारी घुन, जैसे युसेएस सोजेंसिस, ई. हिबिस्की और ई. टुलारेंसिस का इस्तेमाल अंगूर जैसे वैकल्पिक मेज़बानों पर आबादी को प्रभावी रूप से नियंत्रित करने के लिए किया गया है। तैला और उसके लार्वा को नष्ट करने के लिए शाम के समय डायटोमेसियस मिट्टी को पौधे के आधार पर और पत्तियों पर फैला दें। नीम का तेल, स्पाइनोटोरम या स्पिनोसैड को पत्तियों की दोनों तरफ़ और पौधे के आधार के चारों ओर फैला दें।

रासायनिक नियंत्रण

हमेशा एक समेकित दृष्टिकोण से रोकथाम उपायों के साथ-साथ उपलब्ध जैविक उपचारों को अपनाएं। तैला पर नियंत्रण के लिए मैलाथियॉन युक्त घोल का पत्तियों पर छिड़काव किया जा सकता है। एस. डॉर्सेलिस की आबादी घटाने के लिए अन्य कीटनाशकों का इस्तेमाल भी प्रभावी है। उदाहरण के लिए, एबेमेक्टिन, मेथोमाइल और डाईमेथोएट आमतौर पर तैला के विरुद्ध प्रभावी माने गए हैं।

निवारक उपाय

  • यदि उपलब्ध हों, तो प्रतिरोधी किस्में चुनें.
  • तैला (थ्रिप्स) की आबादी नियंत्रित रखने के लिए चिपकने वाले जाल (स्टिकी ट्रैप) का इस्तेमाल करें.
  • विकल्प के रूप में, पत्तियों को संक्रमित पौधों से हटाएं और सफ़ेद कागज़ के टुकड़े पर हल्के से थपथपा कर कीटों को गिरा दें.
  • खेत से भारी संक्रमण वाले पौधों को हटा दें.
  • मिट्टी को अच्छे से सिंचित रखें और नाइट्रोजन उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से बचें.
  • लाभकारी कीटों की आबादी संरक्षित रखने के लिए कीटनाशकों का आवश्यकता से अधिक इस्तेमाल न करें.
  • आसपास वैकपल्पिक मेज़बानों को उगाने से बचें.
  • खेत में और उसके आसपास खरपतवार हटाएं.
  • वायु अवरोधक बाग़ को लंबी दूरी से होने वाले संक्रमण से सुरक्षित रख सकते हैं.
  • तैला के प्यूपा को सतह पर धूप में लाने के लिए मिट्टी की जुताई करें।.