टमाटर के जीवाण्विक धब्बे

  • लक्षण

  • ट्रिगर

  • जैविक नियंत्रण

  • रासायनिक नियंत्रण

  • निवारक उपाय

टमाटर के जीवाण्विक धब्बे

Pseudomonas syringae pv. tomato

बैक्टीरिया


संक्षेप में

  • पत्तियों, तनों तथा फूलों की डंठलों पर पीले छल्लों के साथ गहरे भूरे से काले रंग के धब्बे पाये जाते हैं.
  • धब्बों के एक दूसरे के ऊपर आने से पत्तियों पर असमान धब्बे पड़ जाते हैं.
  • फलों पर छोटे, सतही, उभरे हुए काले धब्बे पाये जाते हैं।.

होस्ट्स:

टमाटर

लक्षण

जीवाणु वृद्धि की सभी अवस्थाओं पर आक्रमण कर सकता है। लक्षण मुख्यतः पत्तियों तथा फलों पर देखे जाते हैं और इनकी विशेषता यह है कि ये दिखने में छोटे, गोल, काले धब्बे होते हैं जिनमें एक सँकरा पीला आभा मण्डल होता है। धब्बे ज़्यादातर बिखरे हुए तथा छोटे होते हैं, परन्तु गम्भीर मामलों में ये एक दूसरे से मिलकर एक दूसरे पर अध्यारोपित हो जाते हैं, परिणामस्वरूप ये बड़े तथा अव्यवस्थित दागदार दिखते हैं। ये इसी तरह पत्तियों की शिराओं तक या किनारों तक आगे बढ़ते हैं, जिससे पत्तियाँ मुड़ जाती हैं। फलों पर, बहुत छोटे, थोड़े से उभरे हुए, काले धब्बे पैदा होते हैं, लेकिन ये केवल सतही ऊत्तकों को ही नुकसान पहुंचाते हैं। जब कच्चे छोटे फल संक्रमित होते हैं, तो धब्बे धँस जाते हैं। गंभीर मामलों में, संक्रमित पौधों का विकास रुक जाता है और फल देर से पकते हैं।

ट्रिगर

रोग के लक्षणों का कारण टमाटर का सुडोमोनास सिरिंजे नामक जीवाणु है, जो मिट्टी, बीजों और संक्रमित पौधों के अवशेषों पर रहते हैं। पौधे लगाने के लिये उपयोग किये जाने वाले संक्रमित बीज इस पदार्थ का पहला स्रोत होते हैं, इसी से जीवाणु बढ़ते हुए पौधों पर आ जाते हैं तथा अपना घर बनाते हैं। ये टमाटर के पत्तों तथा फलों दोनों को प्रभावित करते हैं। संक्रमण का दूसरा स्रोत फलों तथा पत्तियों पर वृद्धि करने वाले जीवाणु होते हैं, जो कि बाद में दूसरे पौधों में बारिश के छींटों और ठंडे नम वातावरण में फैल जाते हैं। बीमारी का प्रकोप कभी-कभी गम्भीर होता है, जो कि पत्तों की उच्च आद्रता, ठंडा वातावरण तथा खेती प्रथाओं से बढ़ता है, जिससे जीवाणु मेज़बान पौधों में फैल जाते हैं।

जैविक नियंत्रण

20% ब्लीच के मिश्रण में 30 मिनट तक बीजों को भिगोकर रखने से जीवाणु पैदा होने से बचने का उपचार किया जा सकता है। क्योंकि इससे अंकुरण की दर प्रभावित हो सकती है इसलिए बीजों को 52 डिग्री सेल्सियस पानी में 20 मिनट तक रख कर भी उपचार किया जा सकता है। कटाई के बीज को टमाटर के गूदे में एक सप्ताह के लिए किण्वन के लिए छोड़ देना चाहिये जिससे रोगाणुओं को मारा जा सके।

रासायनिक नियंत्रण

अगर उपलब्ध हो, तो हमेशा जैविक उपचारों के साथ बचाव के तरीकों का भी साथ में उपयोग करें। रोग के प्रथम लक्षण के बाद से ही कॉपर युक्त जीवाणुनाशी का रोगनिरोधक या रोगनाशक के रूप में इस्तेमाल आंशिक नियंत्रण के लिए कर सकते हैं। जब वातावरण ठंडा, बारिश का तथा नम प्रकार का हो, तो इस निवारक को हर दूसरे सप्ताह के अंतराल में दोहराना चाहिये। यदि कॉपर के प्रति प्रतिरोधकता उतपन्न हो जाये, तो मेंकोज़ेब के साथ जीवाणुनाशी का इस्तेमाल किया जा सकता है।

निवारक उपाय

  • प्रमाणित, स्वस्थ बीजों का ही इस्तेमाल सुनिश्चित करें.
  • यदि आपके क्षेत्र में उपलब्ध हो, तो पौधे लगाते समय प्रतिरोधी प्रकार की किस्में चुनें.
  • उत्पादन क्षेत्र से दूरी पर प्रतिरोपण उत्पन्न करें.
  • हर दूसरे साल फसलें बदलनी चाहिये.
  • जब पौधे गीले हों, तो खेतों में कार्य न करें.
  • पौधों को लगाने तथा प्रबन्धन करते समय प्रत्यारोपण की दुर्घटना से बचें.
  • उत्पादन के मौसम के बाद, खेतों से खरपतवार तथा बचे हुए टमाटर के पौधों को हटायें.
  • पौधों के मध्य उचित दूरी रखें तथा उन्हें सीधा रखने के लिए सहारा लगाएं.
  • फव्वारेदार सिंचाई का प्रयोग न करें, तथा पौधों को नीचे से पानी दें।.