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बिहार की बालों वाली सुंडी

कीट

Spilarctia obliqua


संक्षेप में

  • संक्रमित पत्तियों का सूखना.
  • सभी पत्तियाँ गिर जाना.
  • जालीदार या जालनुमा पत्तियां.
  • लाल पेट और काले धब्बों वाला भूरा पतंगा.
  • काले पीले बालों से ढंकी हुई इल्ली।.
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लक्षण

प्रारंभिक संक्रमित पत्तियां भूरी-पीली हो जाएंगी और सूख जाएंगी। जैसे-जैसे सुंडी आगे बढ़ती है, पूरी पत्ती खा जाती है। ज़्यादा संक्रमण से, पौधों की पत्तियाँ गिर जायेंगी और केवल तना रह जाता है। पत्तियां जालीदार या जालनुमा दिखाई देती हैं और बाद में कंकालनुमा हो जाती हैं।

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प्रभावित फसलें

ट्रिगर

लक्षण अधिकतर स्पिलारक्टिया ओब्लिका की इल्लियों की वजह से होते हैं। वयस्क लाल पेट और काले धब्बों वाला एक मध्यम आकार का भूरे रंग का पतंगा होता है। मादाएं पत्तियों के नीचे गुच्छों में अपने अंडे (1000 / मादा) देती हैं। अंडे फूटने के बाद, सुंडी लंबे पीले रंग के काले बालों से ढंकी रहती है और पौधों के करीब सूखी पत्ती के ढेर में प्यूपा बनाती है। प्रारंभिक सुंडी पत्तियों की निचली सतह पर धीरे-धीरे पर्णहरित (क्लोरोफ़िल) खाती है। बाद के चरणों में, यह पत्तियों को किनारे से पूरी तरह से खाती है। आम तौर पर, सुंडी पूरी तरह से विकसित पत्तियों को पसंद करती हैं, लेकिन ज़्यादा संक्रमण में ऊपरी प्ररोहों पर भी असर पड़ता है। बिहार बालों वाली सुंडी विभिन्न देशों में दालों, तिलहन, अनाज और कुछ सब्ज़ियों और जूट को नुकसान पहुंचाती हैं, जिससे काफ़ी आर्थिक नुकसान होता है। पैदावार में हानि संक्रमण की तीव्रता और मौसम की स्थिति के अनुसार भिन्न होती है क्योंकि 18 से 33 डिग्री सेल्सियस तापमान इस प्रजाति के विकास के लिए अनुकूल होता है।

जैविक नियंत्रण

बिहार की बालों वाली सुंडी की आबादी को आमतौर पर कई प्राकृतिक दुश्मनों द्वारा इल्ली अवस्था में नियंत्रित किया जा सकता है। लाभकारी परजीवी ब्रेकोनिड परजीव्याभ बाघ पतंगा (मेटेयर्स स्पिलोसोमा) और प्रोटैपेंटेलेस ओब्लिकी, ग्लिप्टापेंटेलेस एगेमेमोनिस और कोटेसिया रुफ़िक्रस ततैया के साथ इकेन्युमोनिड एगाथिस ततैया, जालपंख, इन्द्रगोप, मकड़ी, लाल चींटी, व्याधपतंगा, बद्धहस्त कीट, गुबरैला और ढाल मत्कुण (शील्ड बग) हैं।

रासायनिक नियंत्रण

यदि उपलब्ध हों, तो हमेशा जैविक उपचार के साथ रोकथाम के तरीकों के एकीकृत उपाय अपनाएं। कीटनाशकों को सावधानी के साथ इस्तेमाल किया जाना चाहिए क्योंकि कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग से सफ़ेद मक्खी की कई प्रजातियां उनके प्रति प्रतिरोधी हो गई हैं। इसे रोकने के लिए, कीटनाशकों को उचित रूप से बदल कर और मिश्रण का उपयोग करें। जब इल्लियाँ छोटी होती हैं, तो लैम्ब्डा-साइहैलोथ्रिन 10 ईसी का 0.6 मिली / लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें। 50% फ़ेथोएट भी सुंडी की रोकथाम में मदद करता है।

निवारक उपाय

  • प्यूपा से मिट्टी को छुटकारा दिलवाने के लिए गर्मी में गहरी जुताई करें.
  • मानसून से पहले बुवाई करने से बचें.
  • उपयुक्त बीज दर का उपयोग करें, न ज़्यादा और न ही कम.
  • पौधों के बीच में पर्याप्त खाली जगह होनी चाहिए.
  • अच्छी तरह से सड़ी हुई खाद का इस्तेमाल करें.
  • अरहर (जल्दी पकने वाली), मक्का या ज्वार की कुछ किस्मों के साथ उगायें.
  • कीट (अंडों के गुच्छे, सुंडी और किसी भी नुकसान के लिए) के संकेतों के लिए नियमित रूप से खेतों की निगरानी करें.
  • खेत और आसपास के क्षेत्र में ठीक से निराई करें.
  • संक्रमित पौधे के भागों को इकट्ठा करें और उन्हें खेत से दूर नष्ट कर दें.
  • पक्षियों के लिए मचान और खुली जगह बनाएं जिससे वे इल्लियों को खा सकें.
  • व्यापक रूप से असर वाले कीटनाशकों के उपयोग को नियंत्रित करें, क्योंकि इससे लाभकारी कीट प्रभावित हो सकते हैं.
  • कटाई के बाद पौधे के बचे हिस्सों या अपने आप उगे पौधों को हटा दें.
  • गैर-मेज़बान फसल, जैसे चावल या मक्का, के साथ फसल चक्र अपनाएं।.

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